chevron_left  सर्वमङ्गलमन्त्रंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
सर्वमङ्गलमन्त्रं वै मृषावादस्तु पातकः ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमङ्गलसंय़ुक्ता यथाशास्त्रमतन्द्रिताः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमङ्गलसम्भारैर्विधिमन्त्रपुरस्कृतम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमद्य यथाशक्ति तव दास्यामि सुव्रत |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
सर्वमन्नात्प्रभवति विदितं कीर्तय़ामि ते ||
२६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमन्यत्परिक्षीणं सैन्यं ते भरतर्षभ ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
सर्वमन्यदनादृत्य गच्छ यत्र सुय़ोधनः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
सर्वमन्यून्विनीय़ त्वमभि मा वद शौनक ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विरूप उवाच
सर्वमन्योन्यनिकषे निघृष्टं पश्यतस्तव |
११६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
सर्वमप्येतदेकस्य नालं सञ्जय़ कस्यचित् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
सर्वमर्माणि सम्प्रेक्ष्य मर्मज्ञो लघुहस्तवत् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ८०
प्रकृतय़ ऊचुः
सर्वमर्हति कल्याणं कनीय़ानपि स प्रभो ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमल्पेन कालेन देशं चक्रे वशे वली ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
सर्वमव्यक्तमित्युक्तमसर्वः पञ्चविंशकः |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वमस्मिन्गृहे रत्नं मम दुर्योधनस्य च |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
सर्वमांसानि यो राजन्यावज्जीवं न भक्षय़ेत् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमागमय़ामास पाण्डवानां विचेष्टितम् |
२ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमाचष्ट राजर्षिश्चिकीर्षितमथात्मनः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
सर्वमाज्ञाप्यतामाशु परवन्तो वय़ं त्वय़ि ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
सर्वमादीपय़ामास च्यवनो भृगुनन्दनः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमादृत्य कर्तव्यं तद्धर्ममनुवर्तता ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
सर्वमानन्त्यमेवासीदिति नः शाश्वती श्रुतिः ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
सर्वमानन्त्यमेवासीदेवं नः शाश्वती श्रुतिः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वमाम्भसमेवासीत्खं द्यौश्च नरपुङ्गव ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
सर्वमार्यकृतं शौचं वालसंस्पर्शनानि च ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
भीष्म उवाच
सर्वमार्षं हि मन्यन्ते व्याहृतं विदितात्मनः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमावश्यकं चक्रे प्रातःकार्यं जनार्दनः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
सर्वमाविग्नमभवद्धाहाभूतमचेतनम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
सर्वमाविग्नमभवन्न प्राज्ञाय़त किञ्चन |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
सर्वमाविग्नमभवन्न प्राज्ञाय़त किञ्चन |
५३ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वमाश्चर्यमेवैतन्निर्वृत्तं राजसत्तम |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
सर्वमासीज्जगत्पूर्णं पार्थनामाङ्कितैः शरैः |
५८ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
सर्वमासीज्जगद्व्याप्तं तस्मिन्नस्त्रे विसर्जिते ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
सर्वमाहारय़ामास राजा शापभय़ान्मुनेः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
सर्वमित्रः सर्वसहः समरक्तो जितेन्द्रिय़ः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सर्वमुक्तं यथातत्त्वं तस्माच्छममवाप्नुहि ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
सर्वमुच्छेदनिष्ठं स्यात्पश्य चैतद्द्विजोत्तम |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
सर्वमूर्धाभिषिक्तानामाचार्यः स्थविरो गुरुः |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय १७
कृष्ण उवाच
सर्वमूर्धाभिषिक्तानामेष मूर्ध्नि ज्वलिष्यति |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
सर्वमूर्धावसिक्तानामाचार्यो व्रह्मवित्तमः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
सर्वमेकार्णवं दृष्ट्वा नष्टं स्थावरजङ्गमम् |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
ऋषय़ ऊचुः
सर्वमेके प्रशंसन्ति न सर्वमिति चापरे ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय २३
भगदत्त उवाच
सर्वमेतत्करिष्यामि किं चान्यत्करवाणि ते ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
सर्वमेतत्करिष्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम् ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
दुर्योधन उवाच
सर्वमेतत्करिष्यामि यथा त्वं कर्ण मन्यसे |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
सर्वमेतत्ततो दत्त्वा नृपो वाक्यमथाव्रवीत् ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वमेतत्तदा नासीद्धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
सर्वमेतत्तदार्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते जगत् ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५५
भीष्म उवाच
सर्वमेतत्तपोमूलं कवय़ः परिचक्षते |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
सर्वमेतत्तमो विप्राः कीर्तितं वो यथाविधि ||
३४ ख