शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
सर्वतःपाणिपादान्तं सर्वतोक्षिशिरोमुखम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
सर्वतःपाणिपादान्तं सर्वतोक्षिशिरोमुखम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
सर्वतःपाणिपादान्तः सर्वतोक्षिशिरोमुखः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४०
व्रह्मो उवाच
सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वं व्याप्य स तिष्ठति ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
सर्वतःस्रोतसं घोरां नदीं लोकप्रवाहिनीम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सर्वतत्त्वलय़ाच्चैव मधुहा मधुसूदनः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
सर्वतत्त्वविधानज्ञः प्रधानपुरुषेश्वरः ||
१८२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
सर्वतश्च प्रशान्ता ये सर्वभूतहिते रताः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
सर्वतश्च महाराज पर्वतैः परिवारिताः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
सर्वतश्च समाहृत्य क्रतून्सर्वाञ्जितेन्द्रिय़ः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
सर्वतश्चाददेत्प्रज्ञां पतङ्गान्गहनेष्विव |
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सर्वतश्चाभिपन्नैषा धार्तराष्ट्री महाचमूः |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
सर्वतस्तेज आदत्ते नित्यमक्षय़मण्डलः ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
सर्वतीर्थवरे चैव यो वसेत महाह्रदे |
१२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
सर्वतीर्थेषु वा स्नानं सर्वभूतेषु चार्जवम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः ||
७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सर्वतूर्यनिनादी च सर्ववाद्यपरिग्रहः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
सर्वतेजोमय़ं दिव्यं विमानवरमास्थितम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
सर्वतेजोमय़स्तस्मिञ्शय़ानः शय़ने शुभे |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
सर्वतेजोमय़ी दिव्या व्रह्मर्षिगणसेविता |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
सर्वतो निष्पतिष्णूनि पिता वालानिवात्मजान् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वतो भवतः क्षेमं विधेय़ाः सर्वपार्थिवाः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
सर्वतो मामचिन्वन्त सरथं धरणीधरैः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
सर्वतो रथवंशेन गाङ्गेय़ं पर्यवारय़न् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
सर्वतो विनिवार्यैनं शरजालेन पीडय़न् |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
सर्वतो व्यकिरन्वाणैरुल्काभिरिव कुञ्जरम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सर्वतोऽभ्यद्रवन्कर्णं पतत्रिण इव द्रुमम् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
सर्वतोऽभ्यद्रवन्द्रोणं कुन्तीपुत्रपुरोगमाः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
सर्वतोऽभ्यद्रवन्द्रोणं युधिष्ठिरपुरोगमाः ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सर्वतोऽभ्यद्रवन्भीताः कुर्वन्तो महदाकुलम् ||
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
सर्वतोऽभ्याद्रवन्कर्णं परिवार्य जिघांसय़ा ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
सर्वतोय़मय़ो देवो योगात्सुष्वाप तत्र ह ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षय़ात्मकम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षय़ात्मकम् |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
सर्वत्यागेष्वभिरताः सर्वज्ञाः सर्वदर्शिनः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
सर्वत्यागो यथा चेह तथा दानमनुत्तमम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
सर्वत्यागो राजधर्मेषु राजं; स्त्यागे चाहुर्धर्ममग्र्यं पुराणम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
सर्वत्र क्षेमचरणं सुलभं तात गोमिभिः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
सर्वत्र गतिरव्यग्रा भवतां दीर्घदर्शनाः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
सर्वत्र च दय़ावन्तः सन्तः करुणवेदिनः |
९० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३७
भीष्म उवाच
सर्वत्र चानवस्थानमेतन्नाशनमात्मनः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
सर्वत्र जय़माप्नोति न कदाचित्पराजय़म् ||
२० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
सर्वत्र निरतो जीव इतीहापि सुखं मम |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
सर्वत्र निर्जितश्चासि पाण्डवैः सूतनन्दन ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वत्र पाण्डवाः कर्णमजय़न्त रणाजिरे ||
८ ख