आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
सर्वं तत्कारणं येन निकृतोऽय़मिहागतः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५५
भीष्म उवाच
सर्वं तत्तपसा शक्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
सर्वं तत्तपसा साध्यं ज्ञानेन विनय़ेन च ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
सर्वं तत्तव विश्रव्धं कुरु प्रणय़मीश्वर ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
सर्वं तत्ते प्रदाताहं न हि मेऽस्त्यत्र संशय़ः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं तत्त्यजति क्षिप्रमिदं शृण्वन्नरः सदा ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
युधिष्ठिर उवाच
सर्वं तत्त्वेन धर्मज्ञ यथावदिह धर्मतः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
सर्वं तथैव द्रष्टासि विशिष्टं वा जनार्दन ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
सर्वं तदनपत्यस्य मोघं भवति निश्चय़ात् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं तदनुजानामि व्यलीकं न च मे हृदि ||
२६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं तदभिजानामि करिष्यति च पाण्डवः |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
सर्वं तदसुरेन्द्राय़ व्रह्मा भागमकल्पय़त् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
सर्वं तदस्माभिरहत्य धर्मं; ग्राह्यं स्वधर्मं परिपालय़द्भिः ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं तदिह यज्ञे मे स्वय़मेवोपतिष्ठतु |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वं तद्धारय़िष्यामि स ते सेतुर्भविष्यति ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
सर्वं तद्भरतश्रेष्ठ यथावृत्तं स्वय़ंवरे ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वं तद्भस्मसाद्भूतं दृश्यते भरतर्षभ ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
सर्वं तद्वारुणं ज्ञेय़मापस्तस्तम्भिरे पुनः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
भीष्म उवाच
सर्वं तद्व्राह्मणेष्वेव गूढोऽग्निरिव दारुषु ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
कश्यप उवाच
सर्वं तन्नालमेकस्य तस्माद्विद्वाञ्शमं व्रजेत् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
सर्वं तन्नास्ति तच्चैव तज्ज्ञात्वा कोऽनुसञ्ज्वरेत् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं तन्नुदते पश्चाद्यज्ञैर्विपुलदक्षिणैः ||
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
सर्वं तस्य गृहे राज्ञः प्रावर्तत महात्मनः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
सर्वं तस्यां मय़ा दृष्टं तद्विद्धि मनुजाधिप ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
सर्वं तारय़ते वंशं यस्य खाते जलाशय़े |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वं त्वमाय़तीय़ुक्तं भाषसे प्राज्ञसंमतम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
सर्वं त्विदं समाय़त्तं वीभत्सो कर्मणोर्द्वय़ोः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं त्विदमहं पार्थ त्वत्प्रीतिहितकाम्यया |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
सर्वं दास्याम्यशेषेण धनं रत्नानि चैव हि |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
शल्य उवाच
सर्वं दुःखमिदं वीर सुखोदर्कं भविष्यति |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
कर्ण उवाच
सर्वं दुर्योधनस्यार्थे त्यक्तं मे भूरिदक्षिण |
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
सर्वं दृष्ट्वा तदहं धर्मराज; मवोचं वै प्रभविष्णुं पुराणम् |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
सर्वं दैवकृतं तद्वै कोऽत्र किं वक्तुमर्हति ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
सर्वं धनवतः प्राप्यं सर्वं तरति कोशवान् |
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरवुद्धिजैः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भरद्वाज उवाच
सर्वं पश्यति यद्दृश्यं मनोय़ुक्तेन चक्षुषा |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
सर्वं पावय़ते ज्ञानं यो ज्ञानं ह्यनुवर्तते |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
सर्वं पुरुषकारेण कृतेनेहोपपद्यते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
सर्वं प्रमुह्यते ह्येतद्यदा राजा प्रमाद्यति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
सर्वं प्रिय़ाभ्युपगतं धर्ममाहुर्मनीषिणः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
सर्वं भवतु ते राज्यं पञ्च ग्रामान्विसर्जय़ |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं भवद्भिः कर्तव्यमप्रमत्तैर्यथातथम् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
सुधन्वो उवाच
सर्वं भूम्यनृते हन्ति मा स्म भूम्यनृतं वदीः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
सर्वं ममैतद्वचनं समग्रं; सहामात्यं सञ्जय़ श्रावय़ेथाः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
सर्वं मार्गं विलुम्पन्ति लोभाज्ञानेषु निष्ठिताः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
सर्वं मे सुप्रिय़ं देवि यदेतत्कृतवत्यसि ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
सर्वं मय़ा भाषितमेतदेवं; कर्तव्यमन्यद्विविधार्थवच्च ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
सर्वं यतिष्ये तत्कर्तुमृतुपर्ण भरस्व माम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं यथावच्च दिवौकसस्ता; न्पप्रच्छुरेनं कुरुराजपुत्राः ||
२४ ख