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वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
सरांसि च विचित्राणि प्रसन्नसलिलानि च |
४ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
सरांसि च विचित्राणि प्रसन्नसलिलानि च |
४९ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
सरांसि सरितः पार्थाः पश्यन्तः शैलसानुषु ||
६६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १७
शल्य उवाच
सरांसि सरितः शैलाः सागराश्च विशां पते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
सरांसि सरितश्चैव कूपाः प्रस्रवणानि च |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
सरांसि सरितश्चैव पर्वतांश्च वनानि च |
३ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
सरांसि सरितश्चैव मार्त्तिकावतमासदम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
सरांसि सरितश्चैव रमणीय़ांश्च पर्वतान् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
सराक्षसगणा राजन्सकिंनरमहोरगा ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
सराक्षसोरगाः पार्थ विजेतुं युधि कर्हिचित् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
सरागरक्तनेत्रा च तय़ा दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
सरागस्तत्र वसति गुणांस्तेषां समाचरन् ||
१२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
सराजकानि राष्ट्राणि नाभागो दक्षिणां ददौ |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
सराष्ट्रं सप्रजं हन्ति राजानं मन्त्रविस्रवः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सराष्ट्रनगराकीर्णां कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम् ||
९२ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
सराष्ट्रस्त्वं महाराज विनश्येथा न संशय़ः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
सरिच्छ्रेष्ठां च तां गङ्गां वीक्षमाणो वहूदकाम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
सरितः पर्वतांश्चैव पुण्यान्याय़तनानि च ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सरितः सागरं प्राप्य यथा नश्यन्ति सर्वशः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ६१
वृहदश्व उवाच
सरितः सागरांश्चैव ददर्शाद्भुतदर्शनान् ||
७ ग
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
सरितः सागरांश्चैव देशानपि च भारत ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
सरितः सागरांश्चैव नदांश्चैव सरांसि च |
११ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
सरितः सागराः शैला उपासन्त उमापतिम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
सरितः सागराश्चैव गन्धर्वाप्सरसस्तथा |
६८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
सरितः सागराश्चैव गिरय़श्च नरोत्तम |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
भीष्म उवाच
सरितः सागराश्चैव भावाभावौ च पन्नग |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सरितश्चानुदीर्यन्त ध्वजसङ्गश्च नाभवत् ||
१३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
सरितस्तर्पय़न्तीह सुरेन्द्र वसुधाप्रदम् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११४
भीष्म उवाच
सरितां चैव संवादं सागरस्य च भारत ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४०
व्यास उवाच
सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
सरित्तीरेषु कुद्दालैर्वापय़िष्यन्ति चौषधीः |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
सरित्सा हिमवत्पार्श्वात्प्रसूता शीघ्रगामिनी ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
सरिद्भिः सविहङ्गाभिः शिखरैश्चोपशोभितम् |
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
सरीसृपाश्च ये श्रेष्ठास्तेभ्यस्ते स्वस्ति भारत ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
सरीसृपेभ्यः स्तेनेभ्यो न चान्योन्यात्कदाचन |
१२५ क
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
सरो गय़शिरो यत्र पुण्या चैव महानदी |
१० क
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
सरो द्वैतवनं गत्वा गन्धर्वानिदमव्रुवन् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
सरो भिन्नं तय़ा नद्या सरय़ूः सा ततोऽभवत् |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
सरो मानसमासाद्य हाटकानभितः प्रभुः |
५ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
सरो वा सरितं वापि तत्र मुञ्चति भूषणम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
सरो हंसा इवापेतुर्घ्नन्तो द्रोणरथं प्रति ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
सरोभिरतिरम्यैश्च पद्मोत्पलसुगन्धिभिः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय २५२
वैशम्पाय़न उवाच
सरोषरागोपहतेन वल्गुना; सरागनेत्रेण नतोन्नतभ्रुवा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
सरोषस्त्वथ शार्दूलः श्रुत्वा गोमाय़ुचापलम् |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
सरोऽपश्यत्सुरुचिरं पूर्णं परमवारिणा |
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
सरोऽमृतमय़ं दिव्यमभ्याशे शत्रुसूदनौ |
६४ क
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
सरोऽवगाढैः क्रीडद्भिः समन्तादनुनादितम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
याज्ञवल्क्य उवाच
सर्गं तु षष्ठमित्याहुर्वहुचिन्तात्मकं स्मृतम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
सर्गः कालः क्रिय़ा वेदाः कर्ता कार्यं क्रिय़ा फलम् |
७३ क