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उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
समय़े देशकाले च लव्धवान्सुतमीप्सितम् ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
समय़े मुच्यमानस्य सर्पस्येव तनुर्यथा ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११५
नारद उवाच
समय़े समनुप्राप्ते वचनं चेदमव्रवीत् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
समय़े समशीलिन्या श्रद्धावाञ्श्रद्दधानय़ा ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
समय़े समशीलिन्यां धर्मपत्न्यां यशस्विनः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
समय़े स्थातुमिच्छन्ति कच्चिच्च पुरुषर्षभाः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ेन गतोऽरण्यं पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १३
जरत्कारुरु उवाच
समय़ेन च कर्ताहमनेन विधिपूर्वकम् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ेन तपोऽर्धं च कृच्छ्रात्प्रतिगृहीतवान् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ेन तवाद्याहं पाणिं स्प्रक्ष्यामि शोभने |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
समय़ेन विसानीतो गृह्णीध्वं कामकारतः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
उत्तङ्क उवाच
समय़ेनेह राजेन्द्र पुनरेष्यामि ते वशम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
समय़ेनोत्सहे वस्तुं त्वय़ि वीरप्रजाय़िनि ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ो यौवराज्याय़ेत्यव्रवीच्च शकुन्तलाम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
समय़ो ह्येष मे पूर्वं त्वय़ा सह मिथः कृतः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १७१
अर्जुन उवाच
समय़ोऽर्जुन गन्तुं ते भ्रातरो हि स्मरन्ति ते ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
समय़ोऽल्पावशेषो मे नहुषेणेह यः कृतः |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
समय़ोऽय़ं कृतस्तेन साचिव्यमुपगच्छता |
४७ क
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
सरः सुपर्णेन हृतोरगं यथा; राष्ट्रं यथाराजकमात्तलक्ष्मि |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
सरः सुरुचिरप्रख्यमपश्यं पक्षिभिर्वृतम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
सरःपङ्कार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
सरःसु नलिनीजालं विषक्तमिव कर्षताम् ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय ४०
सूत उवाच
सरःसु फुल्लेषु वनेषु चैव ह; प्रसन्नचेता विजहार वीर्यवान् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
सरःसु रमणीय़ेषु पद्मोत्पलय़ुतेषु च ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सरकस्य तु पूर्वेण नारदस्य महात्मनः |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
सरजस्कोऽरजस्कश्च स वै वाय़ुर्यथा भवेत् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
सरजस्तामसैर्भावैश्च्युतो हेतुवलान्वितः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
सरत्नकोशनिचय़ः प्राणेन पणितोऽपि च ||
१८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
सरथं कृतवर्माणं समन्तात्पर्यवाकिरत् |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
सरथं सादिनं तत्र अपरे तु महागजाः |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
सरथः स तु सन्तीर्य गङ्गामाशु पराक्रमी |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
सरथः सध्वजस्तत्र ससूतः पाण्डवस्तदा |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
सरथश्छादितो राजन्धृष्टद्युम्नो न दृश्यते |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
सरथांस्तावकान्सर्वान्हर्षय़ञ्शकुनिस्ततः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
सरथाः सध्वजा वीरा हताः पार्थेन शेरते ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
सरथाः सध्वजाश्चैव स्वानि स्थानानि भेजिरे ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
सरथान्सधनुष्कांश्चाप्यनुज्ञासिषमप्यहम् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
सरथाश्वध्वजं तीक्ष्णैः प्रहसन्वै ससारथिम् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय ६३
द्रौपद्यु उवाच
सरथौ सधनुष्कौ च भीमसेनधनञ्जय़ौ |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
सरमा नाम या माता शुनां देवी जनाधिप |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
सरला मधुराश्चैव यौवनस्थाः स्वलङ्कृताः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
सरश्मिजालनिकरौ युगान्तार्काविवासतुः ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
सरसां सागरः श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
सरसीवामलेऽऽत्मानं द्वितीय़ं पश्य मे सुतम् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्तदासाद्य तु पाण्डुपुत्रा; जनं समुत्सृज्य विधाय़ चैषाम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २२५
जनमेजय़ उवाच
सरस्तदासाद्य वनं च पुण्यं; ततः परं किमकुर्वन्त पार्थाः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय २५
कश्यप उवाच
सरस्यस्मिन्महाकाय़ौ पूर्ववैरानुसारिणौ |
२० क
वन पर्व
अध्याय २९८
युधिष्ठिर उवाच
सरस्येकेन पादेन तिष्ठन्तमपराजितम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
सरस्येव च तं वाणं मुमोचातिवलः प्रभुः |
७७ क