शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
सम्भृताः सर्वसम्भारास्तस्मिन्राजन्महाक्रतौ ||
९ ग
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
सम्भृतो मन्त्रपूतेन वारिणा कलशो महान् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
सम्भृत्य तत्समैरङ्गैर्निर्ममे स्त्रिय़मुत्तमाम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
सम्भृत्य महतीं सेनां चतुरङ्गां महीपतिः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
सम्भृत्य महतीं सेनां चतुरङ्गां युधिष्ठिर |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
सम्भोगसंविद्द्विषमेधमानो; दत्तानुतापी कृपणोऽवलीय़ान् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भोगस्नेहचातुर्यैर्हावलास्यैर्मनोहरैः |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
सम्भोजनं सङ्कथनं सम्प्रश्नोऽथ समागमः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
सम्भोजनं सङ्कथनं सम्प्रीतिश्च परस्परम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
सम्भोजनी नाम पिशाचदक्षिणा; सा नैव देवान्न पितॄनुपैति |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
सम्भ्रमन्त्यापदं प्राप्य महतोऽर्थानवाप्य च ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सम्भ्रमश्च महानासीत्त्रिदशानां विशां पते |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
जनमेजय़ उवाच
सम्भ्रमे तुमुले तस्मिन्यदासीत्कुरुजाङ्गले ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भ्रान्तनरनागाश्वमथ तद्विद्रुतं वलम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
सम्भ्रान्तनरनागाश्वमावर्तत मुहुर्मुहुः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सम्भ्रान्तनागाश्वरथे प्रसूते; महाभय़े सादिपदातिय़ूनाम् |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भ्रान्तमनसः सर्वे काले ह्यस्मिन्महारथाः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
सम्भ्रान्तमनसः सर्वे पूजां चक्रुर्यथाविधि ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
सम्भ्रान्तमनसो राजन्नासन्परमविस्मिताः |
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
सम्भ्रान्तरूपमार्तं च शरवर्षपरिक्षतम् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
सम्भ्रान्ताः पर्यधावन्त तस्मिंस्तमसि दारुणे ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भ्रान्तानां तदार्तानां त्रस्तानां त्राणमिच्छताम् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
सम्भ्रान्ताश्च दिशः सर्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
सम्भ्रान्ताश्वद्विपरथा पदातीनवमृद्नती ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
सम्भ्रान्ते तुमुले घोरे रजोमेघे समुत्थिते |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भ्रिय़न्तां कुरुश्रेष्ठ यज्ञोपकरणानि च ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
सम्यक्कर्मोपसंन्यासात्सम्यक्चित्तनिरोधनात् |
७५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यक्च तं सागरः प्रत्यगृह्णा; न्नागा दिव्याः सरितश्चैव पुण्याः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
सम्यक्चासौ महावीर्यः कुलधुर्य इव स्थितः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
सम्यक्चाय़मनुप्रश्नस्त्वय़ोक्तश्च युधिष्ठिर ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
सम्यक्चैवमुपालव्धो धर्मश्चोक्तः सनातनः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यक्चैवोपचारेण गौतमः प्रीतिमानभूत् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
सम्यक्ताः स्युर्हव्यकव्यौघवत्य; स्तासामुक्ष्णां ज्याय़सां सम्प्रदानम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५८
जनमेजय़ उवाच
सम्यक्ताञ्श्रोतुमिच्छामि राज्ञश्चान्यान्सुवर्चसः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
युधिष्ठिर उवाच
सम्यक्त्वय़ाय़ं नृपते वर्णितः शिष्टसंमतः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
सम्यक्पूजय़ येन त्वं गतिमिष्टामवाप्स्यसि ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
सम्यक्प्रक्षिप्य विद्वांसो जनय़न्ति स्वय़ोनिषु ||
२२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
सम्यक्प्रणीता नागाश्च प्रभिन्नकरटामुखाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यक्प्रणीय़ दण्डं हि कामद्वेषविवर्जिताः |
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
सम्यक्प्रणय़तो दण्डं भूमिपस्य विशां पते |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
सम्यक्प्रपश्यतः सर्वं नाश्रुकर्मोपपद्यते ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्यक्प्रवृत्तान्पुरुषान्न सम्यगनुपश्यतः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
सम्यक्प्रहरणे याने व्यपय़ाने च कोविदम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
सम्यक्प्रहरणे याने व्यपय़ाने च कोविदम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
सम्यक्स धर्मं कृत्वेह परत्र सुखमेधते ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
सम्यक्सङ्कल्पसम्वन्धात्सम्यक्चेन्द्रिय़निग्रहात् |
७४ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
सम्यक्सद्धर्ममूला हि व्यसने शान्तिरुत्तमा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
सम्यगन्वीक्षतां वुद्ध्या शान्तय़ाध्यात्मनित्यया |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३४
व्राह्मण उवाच
सम्यगप्युपदिष्टश्च भ्रमरैरिव लक्ष्यते |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
सम्यगस्तैः शरैः पाण्ड्यो वाय़ुर्मेघानिवाक्षिपत् ||
७ ख