आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
समासो भारतस्याय़ं तत्रोक्तः पर्वसङ्ग्रहः ||
७१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
समास्तस्या व्यतिक्रान्ता वह्व्यः कुरुकुलोद्वह |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
समास्तीर्णा धरा तत्र वभौ पुष्पैरिवाचिता ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
समास्तु शाश्वतीर्हन्याद्यो मां हन्याद्धि संय़ुगे ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
समास्तु समतिक्रान्ता वह्व्यः पूजय़तो मम |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
व्यास उवाच
समास्ते चैव मे सर्वे यूय़ं चैव न संशय़ः |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
समास्थाय़ प्रतीक्षेतां रथवर्यौ परन्तपौ ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
समास्थाय़ मतिं वीरो वीभत्सुः शत्रुतापनः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
समास्थाय़ महातेजाः सार्जुनः प्रय़यौ द्रुतम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
समास्थाय़ार्जुनं तत्र ददृशुस्तपसान्वितम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
समास्थितश्च भगवान्दीप्यमानः स्वतेजसा |
९० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
समास्थितावेकरथे सूर्याचन्द्रमसाविव ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
समास्थितो मध्यगतः कुरूणां; संस्तूय़मानो वन्दिभिर्मागधैश्च ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
समास्थितोऽभिदुद्राव भगदत्तस्य वारणम् ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
समाहतो भृशं राजन्कलिङ्गेन महाय़शाः |
६७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
समाहत्य रणेऽन्योन्यं निपेतुर्गतजीविताः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
समाहितं क्षणं किञ्चिद्ध्यानवर्त्मनि तिष्ठति |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
समाहितं चात्मनि भारमीदृशं; जगत्तथानित्यमिदं च लक्षय़े |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
समाहितं परे तत्त्वे क्षीणकाममवस्थितम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
समाहितः प्रचरेद्दुश्चरं तं; गार्हस्थ्यधर्मं मुनिधर्मदृष्टम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
समाहितमनस्काश्च निय़ताः संय़तेन्द्रिय़ाः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
समाहितश्चरेद्युक्त्या कृतार्थश्च न विश्वसेत् ||
१८५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
गौतम उवाच
समाहितेन चीर्णानि सर्वाण्येव व्रतानि मे |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
समाहितेन मनसा विमुच्यति तथा तथा |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
समाहितो न स्पृहय़ेत्परेषां; नानागतं नाभिनन्देत लाभम् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
समाहितो हि वीभत्सुर्वर्षाण्यष्टौ च पञ्च च |
६ क
वन पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
समाहूतः केनचिदाद्रवेति; नाहं शक्तो भीमसेनापय़ातुम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
समाहूतः स्वय़ं राज्ञा नागानीकमुपाद्रवत् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
समाहूतश्च राजेन्द्रो न शक्ष्यति निवर्तितुम् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
समाहूता कुरुक्षेत्रे दिव्यतोय़ा सरस्वती ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
समाहूता यय़ौ तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ ||
२६ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
समाहूते तु सङ्ग्रामे पार्थे संशप्तकैस्तदा |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
समाहूतेन कितवैरास्थितो द्रौपदीपणः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
समाहूतो निवर्तेत प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
समाहूतो हुतवहः सोऽद्भुतः सूर्यमण्डलात् |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
समाहूय़ तदान्योन्यं भर्त्सय़न्तौ समीय़तुः ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
समाहूय़ तिथौ पुण्ये प्रय़यौ सह कन्यया ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
समाहूय़ तु राजानं क्षत्रधर्मरतं सदा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
समाहूय़ महात्मानं जितवन्तोऽक्षकोविदाः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
समाहूय़ाव्रवीत्सर्वान्भ्रातॄन्कृष्णं च माधवम् ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
समाहूय़ाव्रवीद्भद्रे का त्वं किं च चिकीर्षसि ||
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
समाहृत्य महार्हाणि दारूणां चैव सञ्चय़ान् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
समाहृत्य वनात्तस्मात्काष्ठानि वरवर्णिनी ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
समाह्वानेन तांश्चापि पाण्डुपुत्रा अकल्पय़न् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
समाह्वय़ति यं वाचा गतं वैवस्वतक्षय़म् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
समाह्वय़ेत्तद्वदेतत्तवाद्य; समाह्वानं सूतपुत्रार्जुनस्य ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
पितामह उवाच
समाय़ातः स्वमात्मानं महाभागो महाद्युतिः |
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
समाय़ुक्तस्तु कौन्तेय़ो वासुदेवसहाय़वान् |
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
समाय़ुक्तो महाराज यथा पार्थस्य धीमतः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
समाय़ुक्तो हि कौन्तेय़ो वासुदेवेन धीमता |
२३ क