वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
समाचरामो ह्यनतीतकालं; युधिष्ठिरो यद्यपि नाह किञ्चित् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
उमो उवाच
समाचारैर्गुणैर्वाक्यैः स्वर्गं यान्तीह मानवाः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
समाचिततनुं सङ्ख्ये श्वाविधं शललैरिव ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
समाचितौ कर्णशरैः परन्तपा; वुभौ व्यभातां समरेऽच्युतार्जुनौ |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
समाचिनोच्चापि भृशं शरीरं; हय़ान्सूतं सरथं चैव मह्यम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
समाचिनोद्राक्षसेन्द्रं घटोत्कचमरिन्दम ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
समाचिनोद्वाणगणैः शतघ्नीमिव शङ्कुभिः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
प्रह्राद उवाच
समाचिन्वन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
समाच्छन्नं वभौ सर्वं काद्रवेय़ैरिव प्रभो ||
९७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
समाच्छन्ना धरा सर्वा खं च सर्वा दिशस्तथा ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
समाच्छन्नांस्ततस्तांस्तु राजन्वीक्ष्य स सैनिकान् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
समाच्छाद्यत देशः स विकीर्णैरिव पर्वतैः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
समाजगाम तेजस्वी भ्रातृभिः सहितोऽनघः ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
समाजग्मुः कपिश्रेष्ठाः सुग्रीववचनात्तदा ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
समाजग्मुः सशिष्यांस्तान्प्रतिजग्राह कौरवः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
समाजग्मुरथो वीराः परस्परवधैषिणः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
समाजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुं मुनिगणाः प्रभो ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
समाजग्मुर्महीपालाः सम्प्रहृष्टा महावलाः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
समाजग्मुर्मुनिगणा वहवो व्रह्मवादिनः ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
समाजग्मुश्च युद्धाय़ मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ||
७३ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
समाजग्मुस्तदा साध्व्यः सर्वा एव विशां पते ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
समाजघ्ने महाघोषां जाम्वूनदपरिष्कृताम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
समाजमिव तच्चित्रं प्रेक्षमाणा महारथाः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
समाजवाटः शुशुभे भवनैः सर्वतो वृतः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
समाजोत्सवसम्पन्नं सदापूजितदैवतम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
समाज्ञातानृद्धिमतः प्रतिरूपान्वशे स्थितान् |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
समाज्ञाय़ महावुद्धिरुत्तरादुत्तरोत्तरम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
समादत्त च संरव्धः क्षुरप्रं लोमवाहिनम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
समादत्त शितान्भल्लान्पञ्च पाण्डवनन्दनः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
समादत्त शितान्वाणाञ्शतानीको महावलः ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
समादत्तार्जुनिस्तूर्णं पौरवान्तकरं शरम् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
समाददानः पृथगस्त्रमार्गा; न्यथाग्निरिद्धो गहनं निदाघे |
१०० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
समाददे वाक्यमथाग्रजोऽस्य; सम्पूज्य वाक्यं तदतीव राजन् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
समादधे चान्तकदण्डसंनिभा; निषूनमित्रान्तकरांश्चतुर्दश ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
समादध्यात्पुनश्चेतो ध्यानेन ध्यानय़ोगवित् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
समादध्यान्मनो भ्रान्तमिन्द्रिय़ैः सह पञ्चभिः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
समादाय़ च राजानं प्रविवेश रसातलम् |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
समादाय़ च शल्योऽसिमवप्लुत्य रथोत्तमात् |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
समादाय़ महच्चापं मत्तवारणवारणम् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
समादाय़ महावाहुः सज्यं चक्रे महावलः |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
समादाय़ महावाहुर्महत्कर्म करिष्यति ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
समादाय़ यय़ुस्तूर्णं नगरं दाररक्षिणः ||
६९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
समादाय़ शरश्रेष्ठं कार्मुकान्निरवासृजत् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
समादाय़ शरान्घोरान्महाशनिसमप्रभान् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
समादिशत्पुत्रगृद्धी महर्षि; र्विभाण्डकः परिपृच्छेद्यदा वः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
समादिशद्रणे सर्वान्हत भीममिति स्म ह |
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
समादिष्टो मय़ा क्षिप्रं धनूंष्यवहरोत्तर |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
समाद्रवन्त गाङ्गेय़ं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ||
६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
समाद्रवन्ति पाञ्चाला धार्तराष्ट्रांस्तरस्विनः ||
६० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
समाधत्त च तं वाणं धनुष्युग्रं महावलः |
२६ क