आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
सत्यस्त्वमसि सत्यं मे वद पावक पृच्छते ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
सत्यस्य च महावाहो अनुकम्पार्थमेव च |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सत्यस्य च यथा सन्तो वीजानामिव चोर्वरा ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
सत्यस्य चेह विभ्रंशात्सत्ये कश्चिदवस्थितः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
सत्यस्य रक्षणं चैव व्यवहारस्य चार्जवम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
सत्यस्य वचनं श्रेय़ः सत्यं ज्ञानं हितं भवेत् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
सत्यस्य वचनं श्रेय़ः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
सत्यस्य वचनं श्रेय़ः सत्यादपि हितं भवेत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद्विद्यते परम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद्विद्यते परम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद्विद्यते परम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
सत्यस्यैकस्य राजेन्द्र सत्ये कश्चिदवस्थितः |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
सत्यहान्या ततस्तेषामाय़ुरल्पं भविष्यति ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
सत्यां चिकीर्षमाणस्तु प्रतिज्ञां कुम्भसम्भवः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
सत्यां चिकीर्षमाणस्तु प्रतिज्ञां सत्यसङ्गरः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
सत्यां निस्तीर्णां शत्रुमध्ये च तेन; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
सत्यां प्रतिज्ञां नचिराद्रक्ष्यसे तां सुय़ोधन ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
सत्यां वाचमहिंस्रां च वदेदनपवादिनीम् ||
९ ग
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
सत्याच्च्युतिः क्षत्रिय़स्य न धर्मेषु प्रशस्यते ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
सत्यात्प्रच्यवमानानां व्याधय़ो वहवोऽभवन् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
सत्यात्प्रच्यवमानानां सङ्कल्पो वितथो भवेत् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सत्यात्सत्यं च गोविन्दस्तस्मात्सत्योऽपि नामतः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
सत्याद्धर्मो दमश्चैव सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ||
६४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
सत्याद्भूतानि जातानि भूतं सत्यमय़ं महत् ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
सत्याद्भूतानि जातानि स्थावराणि चराणि च |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
सत्याद्यज्ञोऽसि सम्भूतः कश्यपस्त्वां यथाव्रवीत् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
सत्यानृतात्तदुभय़ं प्राप्यते जगतीचरैः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
सत्यानृते विनिश्चित्य अत्रापि विधिरुच्यते |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
सत्यानृते सत्यसमानवन्धने; सतश्च योनिरसतश्चैक एव |
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
सत्यानृतेन हि कृत उपदेशो हिनस्ति वै ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
सत्यारामः समो दान्तः सत्येनैवान्तकं जय़ेत् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च; धर्मस्तथार्थश्च रतिश्च दारे |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
सत्यार्जवपराः सन्तस्ते वै स्वर्गभुजो नराः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
सत्यार्जवपरो राजन्मित्रकोशसमन्वितः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
सत्यार्जवाभ्यां चरता स्वधर्मं; जितस्तवाय़ं च परश्च लोकः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
सत्यार्जवे धर्ममाहुः परं धर्मविदो जनाः ||
३८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
सत्यार्जवे ह्रीर्दमशौचविद्याः; षण्मानमोहप्रतिवाधनानि ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
सत्यासु नित्यं प्रिय़दर्शनासु; सौभाग्ययुक्तासु गुणान्वितासु |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
सत्याय़ हि यथा नेह जह्याद्धर्मफलं महत् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
सत्ये कुरु स्थिरं भावं मा राजन्ननृतं कृथाः |
७० क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तय़ः ||
६९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
युधिष्ठिर उवाच
सत्ये च किं फलं प्रोक्तं व्रह्मचर्ये च किं फलम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
सत्ये च धर्मे च रतः सदैव; पराक्रमे शत्रुभिरप्रधृष्यः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
सत्ये तपसि तिष्ठन्स न च धर्ममवैक्षत |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
सत्ये तपसि दाने च यज्ञाधिकरणे तथा |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
सत्ये तपसि दाने च यस्य नित्यं रतं मनः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
सत्ये तिष्ठ रतो धर्मे हित्वा सर्वमनार्जवम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
सत्ये धर्मे च निरतस्तस्य शक्र फलं शृणु |
२२ क