वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
श्रुत्वैव चैवं त्वरितो भाङ्गस्वरिरुपस्थितः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वैव तं महाराज वधोपाय़ं महात्मनः ||
१०० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वैव तत्कर्म निय़न्तुमात्मा; शक्यस्त्वय़ा वै सह वान्धवेन ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रुत्वैव तु महात्मानो मुनय़ोऽभ्यद्रवन्द्रुतम् |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वैव तु महाशव्दं धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वैव द्रौपदी चापि शुचिर्भूत्वा समाहिता |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वैव पार्थमाय़ान्तं भीमसेनः प्रतापवान् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वैव शव्दं हि वृकोदरस्य; मुञ्चन्ति सैन्यानि शकृत्समूत्रम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
श्रुत्वैव हास्तिनपुरं द्यूतं चाविनय़ोत्थितम् ||
२२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
श्रुत्वैव हि गतं विष्णुं ममापि मुमुहुर्दिशः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वैवं वदतस्तस्य वाक्यं भीमस्य भारत |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
श्रुत्वैवमृषिपुत्रस्तु दिवं स्तव्ध्वेव विष्ठितः |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वैवाभ्यपतद्भीमः शय़नादविचारय़न् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
श्रुत्वोपास्य सदाचारैः साधुर्भवति स क्वचित् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वोवाच च वार्ष्णेय़ एवमेतदिति प्रभुः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
श्रूय़तां च प्रभो तत्त्वं दिव्यतां चात्मनो नृप |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रूय़तां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
श्रूय़तां चाभिधास्यामो गुणदोषान्नरर्षभाः |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
श्रूय़तां तलय़ोः शव्दो भेर्योराहतय़ोरिव ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रूय़तां नकुलो योऽसौ यथा वागस्य मानुषी ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
श्रूय़तां पार्थ तत्त्वेन विश्वामित्रो यथा पुरा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
भीष्म उवाच
श्रूय़तां पार्थ भद्रं ते सर्वलोकाश्रय़ात्मनाम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
श्रूय़तां पृथिवीपाल क्षरतीदं यथा जगत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
श्रूय़तां पृथिवीपाल यथैषोऽर्थोऽनुगीय़ते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
श्रूय़तां भरतश्रेष्ठ यन्मा त्वं परिपृच्छसि |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रूय़तां यः प्रय़त्नो मे सीतापर्येषणे कृतः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
श्रूय़तां यद्भवानस्मान्प्रश्नं सम्पृष्टवानिह ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
श्रूय़तां यद्यथा चेदं मय़ा सर्वं विचेष्टितम् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रूय़तां राजशार्दूल महदाश्चर्यमुत्तमम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
श्रूय़तामवनीपाल यदेतदनुपृच्छसि |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रूय़ते च महाप्राज्ञ हैहय़ानमितौजसः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
श्रूय़ते तन्महाराज नामृतस्यापसर्पति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रूय़ते तुमुलः शव्दस्तत्र तत्र प्रधावताम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
श्रूय़ते तुमुलः शव्दो रथनेमिस्वनो महान् |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
व्राह्मणा ऊचुः
श्रूय़ते तौ महात्मानौ नरनाराय़णावुभौ |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
श्रूय़ते न स मां हन्यादिति तस्मादपाक्रमे ||
१० ग
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
श्रूय़ते निगृहीतो वै पुरस्तात्पारदारिकः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
श्रूय़ते निनदो घोरस्त्वद्वन्धूनां परन्तप ||
९४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
श्रूय़ते परमोदारः पतङ्गोऽसौ विभावसुः |
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रूय़ते भगवान्देवः सर्वगुह्यमय़ो गुहः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
श्रूय़ते यादवी कन्या अनुरूपा कुलस्य नः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
श्रूय़ते रथघोषश्च वासवस्येव नर्दतः |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
श्रूय़ते वदसे तच्च दुष्प्रापमिति सत्तम ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रूय़ते वहुधा भीम सर्वभूतमनोहरः ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
श्रूय़ते शम्वुके शूद्रे हते व्राह्मणदारकः |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
श्रूय़ते श्रूय़ते चेति क्षम्यते चेति माधव |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
श्रूय़ते सोऽद्य न तथा केकय़ानां च वेश्मसु ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
श्रूय़ते स्त्री ह्यसौ पूर्वं तस्माद्वर्ज्यो रणे मम ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
श्रूय़ते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९६
कर्ण उवाच
श्रूय़ते हि पुरा कश्चिदम्वुवीच इति श्रुतः |
१७ क