शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
शृणु शिष्य महाप्राज्ञ व्रह्मगुह्यमिदं परम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
शृणु संसार्यमाणानां पदार्थैः पदवाक्यतः ||
८० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११४
वृहस्पतिरु उवाच
शृणु सङ्कीर्त्यमानानि षडेव भरतर्षभ ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
शृणु सङ्कीर्त्यमानास्ता निखिलेन युधिष्ठिर ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
शृणु सञ्जय़ मे सर्वं न मेऽसूय़ितुमर्हसि |
९६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
शृणु सर्वं यथावृत्तं घोरं वैशसमच्युत ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
शृणु सर्वमशेषेण यत्त्वां वक्ष्यामि तत्त्वतः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
शृणु सर्वमशेषेण यदिदं येन हेतुना |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
शृणु सर्वमिदं दैत्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
शृणु सर्वमिदं वृत्तं पूर्वदेहे ममानघ ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
शृणु हन्त महाराज विधिना येन दृष्टवान् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
शृणुताव्यग्रमनसः शंसतो मे द्विजर्षभाः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
शृणुध्वं क्षत्रिय़ाः सर्वे यावन्तः स्थ समागताः |
५९ क
विराट पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
शृणुध्वं यत्करिष्यामि कर्म वै कुरुनन्दनाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
शृणुध्वमाख्यानवरमेतदार्षेय़मुत्तमम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११
ऋषय़ ऊचुः
शृणुमस्ते वचस्तात पन्थानो विदितास्तव |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
शृणुष्व मम कौन्तेय़ तिलदानस्य यत्फलम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
शृणुष्वागमने हेतुं विदुरावहितो भव ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
सञ्जय़ उवाच
शृणुष्वानवशेषेण वदतो मम पार्थिव ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
शृणुष्वावहितः सर्वं यदिदं सत्यविक्रम ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
शृणुष्वावहितो भूत्वा गदतो मम माधव ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
शृणुष्वावहितो भूत्वा यत्ते वक्ष्यामि भारत ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
शृणुष्वावहितो राजञ्जापकानां गतिं विभो |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
शृणुष्वावहितो राजञ्शुचिर्भूत्वा समाहितः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
शृणुष्वावहितो राजञ्शुचिर्भूत्वा समाहितः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
शृणुष्वावहितो राजञ्श्राद्धकल्पमिमं शुभम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
शृणुष्वावहितो राजन्गदतो मे महाभुज ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
शृणुष्वावहितो राजन्द्विजानां भरतर्षभ |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विरूप उवाच
शृणुष्वावहितो राजन्यथैतद्धारय़ाम्यहम् |
९० क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
शृणुष्वावहितो राजन्राज्ञस्तस्य महात्मनः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
शृणुष्वैकमना राजन्यन्मां त्वं परिपृच्छसि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
भीष्म उवाच
शृणुष्वैकमनाः पार्थ छिन्नधर्मार्थसंशय़म् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
शृणुष्वैकमनाः पुत्र गह्वरं ह्येतदन्तरम् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
शृणुष्वैतदुपाख्यानं यथावृत्तं जनेश्वर |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
शृणुष्वैव च मे वाक्यं जय़द्रथवधं प्रति ||
१६ ग
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
शृणुय़ाद्यः स धर्मात्मा पुत्रवांश्च भवेन्नरः ||
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
शृणुय़ाद्यदि कल्याणि कृत्स्नं जह्यात्स जीवितम् ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
शृणुय़ास्ते च यद्व्रूय़ुः कुर्याश्चैवाविचारय़न् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भरद्वाज उवाच
शृणोति कथितं जीवः कर्णाभ्यां न शृणोति तत् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
शृणोति प्रतिकूलानि द्विषतां वशमेति सः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
शृणोति प्रतिकूलानि विमना नचिरादिव ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
शृणोति हि व्राह्मणानां समेत्य; मित्रद्रोहः पातकेभ्यो गरीय़ान् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
शृणोत्ययं प्रोच्यमानं गृह्णाति च यथातथम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
शृणोमि कालो हिंसते धर्मवीर्यं; सेय़ं प्राप्ता वर्धते धर्मपीडा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
शृणोमि च नानपत्यस्य लोका सन्तीति ||
६७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
सृञ्जय़ उवाच
शृणोमि ते नारद वाचमेतां; विचित्रार्थां स्रजमिव पुण्यगन्धाम् |
१३८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
वसिष्ठ उवाच
शृणोमि ते रवं भद्रे विनदन्त्याः पुनः पुनः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
जनक उवाच
शृणोमि वाचं तव दिव्यरूपा; ममानुषीं दिव्यरूपोऽसि साक्षात् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
शृणोषि चेन्महावाहो व्रूहि किं करवाणि ते ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
अध्वर्युरु उवाच
शृणोष्याकाशजं शव्दं मनसा मन्यसे मतिम् |
२० क