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आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
शूलस्थः स तु धर्मात्मा कालेन महता ततः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
शूलाग्रे तप्यमानेन तपस्तेन महात्मना |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
सञ्जय़ उवाच
शूलाच्छूलसहस्राणि निष्पेतुस्तस्य तेजसा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
शूलानि च भुशुण्डीश्च मुमुचुर्दानवा मय़ि ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
शूलासिहस्ताश्च तथा महाकाय़ा महावलाः ||
१०४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
शूलिनं जटिलं गौरं वल्कलाजिनवाससम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
शूलिने त्रिदशेशाय़ त्र्यम्वकाय़ महात्मने |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
लुव्धक उवाच
शूली देवो देववृत्तं कुरु त्वं; क्षिप्रं सर्पं जहि मा भूद्विशङ्का ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
शूले प्रोतः पुराणर्षिरचोरश्चोरशङ्कय़ा |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्वलान्वलवत्तराः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्वलान्वलवत्तराः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शूलेन भृशतीक्ष्णेन ताडय़ामास पाण्डवम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
शूलैरिव शिरो विद्धमिदं संलक्षय़ाम्यहम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
शृङ्गं गिरेः समासाद्य तस्थौ सूर्य इवोदितः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
शृङ्गवांस्तु महाराज पितॄणां प्रतिसञ्चरः ||
४९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
शृङ्गवान्मन्दरो नीलो निषधो दर्दुरस्तथा ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
शृङ्गाटकं महाराज परव्यूहविनाशनम् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
शृङ्गाटकेषु सर्वेषु आख्यातु विजय़ं मम ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
शृङ्गाणि च व्यशीर्यन्त गिरेस्तस्य समन्ततः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १२५
लोमश उवाच
शृङ्गाणि त्रीणि पुण्याणि त्रीणि प्रस्रवणानि च |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
शृङ्गाणि वै शृङ्गवतस्त्रीण्येव मनुजाधिप |
८ क
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
शृङ्गाणि सानूनि च पश्यमाना; गिरेः परं हर्षमवाप्य तस्थुः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
शृङ्गाणीव गिरेर्वज्रैर्दार्यमाणान्मय़ा युधि ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय ९
रुरुरु उवाच
शृङ्गाररूपाभरणा उत्तिष्ठतु मम प्रिय़ा ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
शृङ्गारवेषाः सुश्रोण्यो भावैर्युक्ता मनोहरैः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
शृङ्गारवेषाभरणा प्रत्युद्यातु वृहन्नडाम् ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय ६६
अर्जुन उवाच
शृङ्गारवेषाभरणौ रूपवन्तौ यशस्विनौ |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
शृङ्गार्थे समुपासन्त ताः किल प्रभुमव्ययम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३७
कृश उवाच
शृङ्गिंस्तव पिताद्यासौ तथैवास्ते यतव्रतः |
९ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
शृङ्गिणं तं यथोक्तेन रूपेणाद्रिमिवोच्छ्रितम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
शृङ्गी तत्राजगामाशु तदा भरतसत्तम ||
३५ ग
आदि पर्व
अध्याय ३६
सूत उवाच
शृङ्गी नाम महाक्रोधो दुष्प्रसादो महाव्रतः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
शृङ्गी नाम महातेजास्तिग्मवीर्योऽतिकोपनः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
शृङ्गी शृङ्गप्रिय़ो वभ्रू राजराजो निरामय़ः |
१४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
शृङ्गेभ्यो भीमसेनश्च सात्यकिश्च महारथः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
शृङ्गैर्वहुविधाकारैर्धातुमद्भिरलङ्कृतम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
शृणु कार्त्स्न्येन मत्तस्त्वं राजधर्मान्युधिष्ठिर |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
शृणु कुन्ति कथां चेमां शारदण्डाय़नीं प्रति |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
शृणु कौन्तेय़ यो वृत्तो व्रह्मदत्तनिवेशने |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
शृणु कौन्तेय़ रामस्य मय़ा यावत्परिश्रुतम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
शृणु कौरव्य यो दण्डो व्यवहार्यो यथा च सः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
शृणु गुह्यमिदं पार्थ यथा वृत्तं पुरानघ ||
२२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
शृणु गुह्यमिदं राजन्देवानां भरतर्षभ |
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
शृणु गोविन्द यानेतान्पूजय़ाम्यरिमर्दन |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
शृणु चात्रोपमामेकां या वृद्धेभ्यः श्रुता मय़ा |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
शृणु चेदं महाराज व्रह्मभूतस्तवं मम |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
शृणु चेदं वचो मह्यं सत्येन वदतः प्रभो |
३४ क
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
शृणु चेदं वचो राम श्रुत्वा कर्तव्यमाचर ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
शृणु चैव सरस्वत्यास्तीर्थवंशस्य पुण्यताम् ||
८८ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
शृणु जन्म तु कौरव्य कार्त्तिकेय़स्य धीमतः ||
१ ख