वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
शुष्येत्तोय़निधिः कृष्णे न मे मोघं वचो भवेत् ||
११७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
शूद्र एतान्परिचरेत्त्रीन्वर्णाननसूय़कः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
शूद्रं तु मोक्षय़न्राजा शरणार्थिनमागतम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
शूद्रं वैश्यं राजपुत्रं च राजँ; ल्लोकाः सर्वे संश्रिता धर्मकामाः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
शूद्रं हत्वाव्दमेवैकमृषभैकादशाश्च गाः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
शूद्रः करोति शुश्रूषां वैश्या विपणिजीविनः |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भीष्म उवाच
शूद्रः पशुसखश्चैव भर्ता चास्या वभूव ह ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
शूद्रः पैजवनो नाम सहस्राणां शतं ददौ |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
शूद्रः स्वकर्मनिरतः स्वर्गं शुश्रूषय़ार्च्छति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
शूद्रकर्मा यदा तु स्यात्तदा पतति वै द्विजः ||
२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
शूद्रकर्माणि सर्वाणि यथान्याय़ं यथाविधि |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति तपःसत्यविवर्जिताः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
शूद्रधर्मः परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
शूद्रधर्मः समाख्यातस्त्रिवर्णपरिचारणम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
शूद्रविट्क्षत्रवीराणां धर्म्यं स्वर्ग्यं यशस्करम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
शूद्रश्चण्डालमत्युग्रं वध्यघ्नं वाह्यवासिनम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
शूद्रसंस्कारको विप्रो यथा याति पराभवम् |
८२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
शूद्रस्त्रीवधको यश्च पूर्वः पूर्वस्तु गर्हितः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
शूद्रस्य समभागः स्याद्यदि पुत्रशतं भवेत् ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
शूद्रस्य स्यात्सवर्णैव भार्या नान्या कथञ्चन |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
शूद्रस्यापि विधीय़न्ते यदा वृत्तिर्न जाय़ते ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
शूद्रस्यापि विनीतस्य चतुर्भागफलं स्मृतम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
शूद्रस्यापि हि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि भारत |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वासुदेव उवाच
शूद्रा दासं पशुपालं तु वैश्या; वधार्थीय़ं त्वद्विधा राजपुत्री ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
शूद्रा धर्मं प्रवक्ष्यन्ति व्राह्मणाः पर्युपासकाः |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
गौतम उवाच
शूद्रा पुनर्भूर्भार्या मे सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
शूद्रा भैक्षेण जीवन्ति व्राह्मणाः परिचर्यया |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
शूद्रा विप्रोत्तमार्हाणि राङ्कवान्यजिनानि च ||
७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
शूद्रा शूद्रस्य चाप्येका शूद्रमेव प्रजाय़ते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
शूद्रां शय़नमारोप्य व्राह्मणः पीडितो भवेत् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
शूद्राः परिचरिष्यन्ति न द्विजान्युगसङ्क्षय़े ||
६४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
शूद्राणां चान्नकामानां नित्यं सिद्धमिति व्रुवन् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
शूद्राणामुपदेशं च ये कुर्वन्त्यल्पचेतसः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
शूद्रादाय़ोगवश्चापि वैश्याय़ां ग्रामधर्मिणः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
शूद्रान्नं गर्हितं देवि देवदेवैर्महात्मभिः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
शूद्रान्नवर्जनं धर्मस्तथा सत्पथसेवनम् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
शूद्रान्निषादो मत्स्यघ्नः क्षत्रिय़ाय़ां व्यतिक्रमात् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
शूद्रान्नेनावशेषेण जठरे यो म्रिय़ेत वै |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
शूद्राभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
शूद्राभीराथ दरदाः काश्मीराः पशुभिः सह |
६६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
शूद्राभीरान्प्रति द्वेषाद्यत्र नष्टा सरस्वती ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
शूद्राश्च व्राह्मणीं भार्यामुपय़ास्यन्ति निर्भय़ाः ||
११२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
शूद्राश्चतुर्णां वर्णानां नानाकर्मस्ववस्थिताः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
शूद्रास्तु मन्दगे नित्यं पुरुषा धर्मशीलिनः ||
३५ ग
सभा पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
शूद्राय़ां गौतमो यत्र महात्मा संशितव्रतः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
शूद्राय़ां चैव कौन्तेय़ तय़ोर्विनिय़मः स्मृतः ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
शूद्राय़ां जनय़न्विप्रः प्राय़श्चित्ती विधीय़ते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
शूद्राय़ां जनय़ामास पुत्रान्दुष्कृतकारिणः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
शूद्राय़ां व्राह्मणाज्जातो नित्यादेय़धनः स्मृतः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
युधिष्ठिर उवाच
शूद्राय़ां व्राह्मणाज्जातो यद्यदेय़धनः स्मृतः |
२७ क