chevron_left  शुश्रूषन्नतिथिंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
शुश्रूषन्नतिथिं प्राप्तं तपः सञ्चिनुते महत् ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
व्यास उवाच
शुश्रूषमाणमेकाग्रं मोक्ष्यते महतो भय़ात् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रूषमाणाः पार्थानां वचो धर्मार्थसंहितम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
शुश्रूषमाणामासीनां पितुरङ्के युधिष्ठिर ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
शुश्रूषमाणे नृपतौ प्रेत्य चेह सुखावहाः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रूषवः पाण्डवास्ते व्राह्मणाश्च समागताः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
शुश्रूषवश्चानभिमानिनश्च; परस्परं सौहृदमास्थिताश्च |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
शुश्रूषवश्चापि जितेन्द्रिय़ाश्च; ज्ञानागमे चापि गताः स्म निष्ठाम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
शुश्रूषवोऽनसूय़न्तस्तान्नमस्यामि यादव ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
शुश्रूषस्व स्थिरो भूत्वा तव ह्यपनय़ो महान् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
शुश्रूषस्व स्थिरो भूत्वा दुराचरितमात्मनः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रूषा तु द्विजातीनां शूद्राणां धर्म उच्यते |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
शुश्रूषा तु वलं स्त्रीणां क्षमा गुणवतां वलम् ||
७२ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
शुश्रूषा यदि वो विप्रा व्रुवतश्च कथाः शुभाः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
शुश्रूषां कर्तुमिच्छामि प्रपन्नाय़ प्रसीद मे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रूषां तत्परा राजन्कृतवन्तो वय़ं तदा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
शुश्रूषां नाम मे कर्तुं सखे मम न तत्क्षमम् ||
१६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
शुश्रूषां परिचर्यां च करोत्यविमनाः सदा |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
शुश्रूषां परिचर्यां च ज्येष्ठे वर्णे प्रय़त्नतः |
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
शुश्रूषां परिचारं च देववद्या करोति च |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
शुश्रूषां सततं कुर्वन्गुरोः सम्प्रणमेत च |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
शुश्रूषाकृतकृत्यस्य कृतसन्तानकर्मणः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
शुश्रूषाभिस्तपोभिश्च श्रुतमादाय़ भारत |
८४ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रूषार्थं पितुर्नावं तां तु वाहय़तीं जले |
५६ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
शुश्रूषाय़ां च निरता द्विजानां वृषलास्तथा ||
१०० ख
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
शुश्रूषाय़ां रताः शूद्रास्तथा वर्णत्रय़स्य च |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १९७
स्त्र्यु उवाच
शुश्रूषाय़ाः फलं पश्य पत्युर्व्राह्मण यादृशम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
शुश्रूषितस्तेन तदा दैत्येन्द्रो वाक्यमव्रवीत् ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रूषुं मम वार्ष्णेय़ माद्रीपुत्रं प्रचक्ष्व मे ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
शुश्रूषुः श्रुतवाञ्श्रोता ऊहापोहविशारदः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
शुश्रूषुमनसूय़ं च व्रह्मण्यं सत्यसङ्गरम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
शुश्रूषुरनहंवादी क्षत्रधर्मव्रते स्थितः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
शुश्रूषुरनहंवादी शुचिः पौरवनन्दनः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रूषुरनहंवादी संय़तात्मा जितेन्द्रिय़ः |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
कृप उवाच
शुश्रूषुरपि दुर्मेधाः पुरुषोऽनिय़तेन्द्रिय़ः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
शुश्रूषुराचार्यवशानुवर्ती; दीर्घं कालं सोऽध्ययनं चकार ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रूषुर्निरभीमाना पतीनां चित्तरक्षिणी ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
कृप उवाच
शुश्रूषुस्त्वेव मेधावी पुरुषो निय़तेन्द्रिय़ः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षेः परिकीर्तनम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
सृञ्जय़ उवाच
शुश्रूषे ते वचनं व्रह्मवादि; न्न ते तृप्याम्यमृतस्येव पानात् ||
१३९ ख
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रूषय़ा क्लिश्यमानाः पतिलोकं जय़न्त्युत ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
नारद उवाच
शुश्रूषय़ा च भक्त्या च प्रीतिमानित्युवाच तम् |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
राजो उवाच
शुश्रूषय़ा चापि गुरूनुपैमि; न मे भय़ं विद्यते राक्षसेभ्यः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
शुष्ककण्ठः पिपासार्तः पाणीय़ार्थी भृशं नृपः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
शुष्कवृक्षमिवारण्यमदृश्यमभवत्पुरम् ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
शुष्कां चापि नदीं गत्वा जलनैराश्यकर्शिताः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
शुष्काशन्यश्च निष्पेतुः सनिर्घाताः सविद्युतः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावा; त्तस्मात्पापैः सह सन्धिं न कुर्यात् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावा; न्न मिश्रः स्यात्पापकृद्भिः कथञ्चित् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
शुष्येत्तोय़ं समुद्रेषु वह्निरप्युष्णतां त्यजेत् ||
३० ख