सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे रथवर्योऽसौ दुर्जय़ः सर्वधन्विभिः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे राजमध्यस्थो नीलवासाः सितप्रभः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे वदनं तस्य सुदंष्ट्रं चारुलोचनम् |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे वदनं तस्या रुदन्त्या विरतं तदा |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे विद्रवन्भीष्मं विद्युन्माली यथाम्वुदः ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे विमलश्चन्द्रस्तारागणवृतो यथा ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे विमलार्चिष्मञ्शरदीव दिवाकरः ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे स नरव्याघ्रो गिरिः सूर्योदय़े यथा ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे स महाराजः सचन्द्र इव पर्वतः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे स महावाहुर्गदाखड्गधनुर्धरः |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे संवृतो राजा वेदी त्रिभिरिवाग्निभिः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
शुशुभे सर्वतो राजन्प्रदीप्त इव किंशुकः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे सा सभा राजन्राजभिस्तैः समागतैः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे सा सभा राजन्सिंहैरिव गिरेर्गुहा ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे स्थानमत्यर्थं देवदेवस्य पार्थिव ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे हिमवत्पादे भूतैर्भूतपतिर्यथा ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे हिमवत्पृष्ठे वसमानोऽर्जुनस्तदा ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभेऽतीव तद्राजन्गङ्गाद्वारं महात्मभिः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभेऽभ्रविनिर्मुक्तं ग्रहैरिव नभस्तलम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
शुशोच दुःखसन्तप्तः स्मृत्वा कर्णं महारथम् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
शुशोच शल्यं सङ्ग्रामे निहतं पाण्डवैस्तदा ||
२४ ग
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्राव कृष्णां च तथा निषण्णां; ते चापि सर्वे ददृशुर्मनुष्याः ||
१२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्राव तत्र वदतां दीना वाचः समन्ततः ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
शुश्राव तपसि श्रान्तमुदारं चण्डकौशिकम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
शुश्राव तस्य वैदेही ततस्तां करुणां गिरम् |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्राव मधुरा वाचः पुनः पुनरुदीरिताः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
शुश्राव मधुरा वाचो नानादेशनिवासिनाम् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्राव मनुजव्याघ्रो विततेष्विह कर्मसु ||
३१ ख
मौसल पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्राव वृष्णिचक्रस्य मौसले कदनं कृतम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्राव सहिता राजन्वृण्वतीर्वै स्वय़ं वरम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
शुश्रावार्तस्वरं घोरमथ मुक्तं स्त्रिय़ा तदा ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
शुश्रुवुर्दारुणा वाचः प्रेतानामिव भारत ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रुवुर्मधुरां वाणीं वेदवेदाङ्गभूषिताम् ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रुवुस्ते तदा वीराः पितुस्ते जन्म भारत ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
शुश्रुवे तुमुलं शव्दं जलदोपमनिःस्वनम् ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
शुश्रुवे तुमुलः शव्दः क्रोशतामितरेतरम् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
शुश्रुवे दारुणः शव्दः सुपर्णपतने यथा ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
शुश्रुवे दिक्षु सर्वासु तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
शुश्रुवे दिक्षु सर्वासु तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः |
२४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रुवे पितरं वृद्धं निर्यातं गजसाह्वय़ात् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रुवे वेदविदुषां पुष्कलार्थपदाक्षरा ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
शुश्रुवे शक्रमुक्तानामशनीनामिव स्वनः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
शुश्रुवे सुमहाञ्शव्दः पततामश्मनामिव ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
शुश्रुवे सुमहाञ्शव्दो वलस्य तव भारत ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
शुश्रूषकः स्वस्य कुलस्य स स्या; त्स्वं चारित्रं नित्यमथो न जह्यात् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
शुश्रूषणं चापि तथार्थहेतो; रकार्यमेतत्परमं द्विजस्य ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
शुश्रूषणपरा नित्यं सततं संय़तेन्द्रिय़ा ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
शुश्रूषते यः पितरं न चासूय़ेत्कथञ्चन |
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
शुश्रूषध्वं यथावृत्तं धर्मं व्याससमासतः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
शुश्रूषध्वं व्राह्मणेन्द्रास्त्वं च तात युधिष्ठिर |
१० क