आदि पर्व
अध्याय
१२३
द्रोण उवाच
शीघ्रं भवन्तः सर्वे वै धनूंष्यादाय़ सत्वराः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रं मां वहस्वेति ||
४५ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रं हि त्वा निहतं सानुवन्धं; संस्मार्याहं प्रतिवक्ष्यामि मूढ ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
शीघ्रकारी ततो भूत्वा प्रसह्यापि दहेत नः ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रकृद्रथवाहांश्च तथोभौ पार्ष्णिसारथी ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रगान्पुरुषान्राजन्प्रेषय़ामासतुस्तदा ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रगेन रथेनाशु स दूतः प्राप्य यादवान् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
शीघ्रतां नरसिंहस्य पाण्डवेय़स्य पश्यत ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रत्वमेव पार्थस्य पूजय़न्ति स्म चेतसा ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
शीघ्रमन्यत्र गच्छामः पन्था यावन्न दुष्यति ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
शीघ्रमभ्यपतत्सेनां भारतीं भरतर्षभ ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
शीघ्रमभ्यस्यतो वाणान्सन्दधानस्य चानिशम् |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रमाचक्ष्व मे तत्त्वं पश्य मे तपसो वलम् ||
२३ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
शीघ्रमिच्छामि यथोपपन्नमन्नमुपहृतं भवतेति ||
१२४ ग
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रमुक्त्वा यथाकामं यत्ते कार्यं विवक्षितम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
३५
सूत उवाच
शीघ्रमेत्य ममाख्येय़ं तन्नः श्रेय़ो भविष्यति ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रमेव गुडाकेशः कृतास्त्रः पुरुषर्षभः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
शीघ्रमेव भवस्वाग्निस्त्वं पुनर्लोकभावनः |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
शीघ्रहस्तश्चित्रय़ोधी युय़ुधानमुपाद्रवत् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रहस्तौ दृढक्रोधौ नित्ययुक्तौ तरस्विनौ ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
शीघ्रां च पिच्छिलां चैव भारद्वाजीं च निम्नगाम् |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्राच्छीघ्रतरं पार्थः शरानन्यानुदीरय़त् ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
भीम उवाच
शीघ्राच्छीघ्रतरं राजन्वाजिभिर्गरुडोपमैः ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
शीघ्रास्त्रश्चित्रय़ोधी च कृती चाद्भुतविक्रमः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
शीघ्रास्त्रश्चित्रय़ोधी च भविष्यसि सुसंमतः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
शीघ्रास्त्रा दिवमावृत्य परिवव्रुः समन्ततः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
शीघ्रास्त्रौ चित्रय़ोद्धारौ कृतिनौ दृढविक्रमौ ||
१२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
शीघ्रोऽनिल इवाक्रन्दे चरन्क्रुद्ध इवान्तकः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
६४
ऋतुपर्ण उवाच
शीघ्रय़ाने सदा वुद्धिर्धीय़ते मे विशेषतः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
शीघ्रय़ाने सुकुशलो मृष्टकर्ता च भोजने ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
शीतं वासं समासाद्य श्रान्तो मदविमोहितः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
शीततोय़ो वहुजलः पुण्यस्तात शिवश्च सः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
शीतमारुतसंय़ुक्तं जगामान्यन्महद्वनम् ||
३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
शीतमुष्णं तथा वर्षं कालेन परिवर्तते |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
शीतमुष्णं तथा वर्षं क्षुत्पिपासे च भारत ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
शीतमुष्णं तथैवार्थमनर्थं प्रिय़मप्रिय़म् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२९५
वैशम्पाय़न उवाच
शीतलच्छाय़मासाद्य न्यग्रोधं गहने वने |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
शीतलच्छाय़मासाद्य न्यग्रोधं वहुशाखिनम् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
शीतलानि च तोय़ानि क्वचिदुष्णानि भारत |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासाश्रमक्षमः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासाश्रमान्वितः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
शीतवातातपसहां गृहभूमिं सुसंस्कृताम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
शीतवातातपसहांस्तपसा चैव कर्शितान् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
शीतवातातपैश्चैव कर्शितौ पुरुषोत्तमौ |
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
शीतश्च वाय़ुः प्रववौ प्रय़ाणे तस्य धीमतः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
शीतस्तत्र ववौ वाय़ुः सुगन्धो जीवनः शुचिः |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
शीतस्यामृतकल्पस्य दिव्यगन्धरसस्य च ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
शीतांशुश्चन्द्र इत्युक्ते को लोके विस्मय़िष्यति |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
व्यास उवाच
शीताभिरद्भिरष्ठीलामिमां च परिषिञ्चत ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
शीतामलजलं हृद्यं द्वितीय़मिव सागरम् |
५४ क