द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
शरैश्चावाकिरद्राजञ्शैनेय़ं तनय़स्तव ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
शरैश्चिच्छेद पुत्रस्ते त्रिभिरेव विशां पते ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
शरैश्चिताङ्गो भुवि भाति कर्णो; हतोऽपि सन्सूर्य इवांशुमाली ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
शरैश्चैनं सुनिशितैः क्षिप्रं विव्याध सप्तभिः ||
४७ ग
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
शरैस्तस्य दिशः सर्वाश्छादय़ामास वीर्यवान् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
शरैस्त्वां शोषय़िष्यामि दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
शरोग्ररश्मिः शुचिशुक्रमध्यगो; यथैव सूर्यः परिवेषगस्तथा ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
शरोर्मिणं ध्वजावर्तं नागनक्रं दुरत्ययम् |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
शरौघजालैरतितिग्मतेजैः; कालं यथा मृत्युकृतं क्षणेन ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
शरौघजालैर्विमलाग्निवर्णै; र्निवारय़ामास किरीटमाली ||
१११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
शरौघवर्षाकुलवृष्टिमांश्च; सङ्ग्राममेघः स वभूव राजन् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
शरौघाञ्शरजालेन विदुधाव धनञ्जय़ः |
५२ ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
शरौघान्प्रतिगृह्णातु मय़ा मुक्तान्सहस्रशः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
शरौघान्प्रेषय़ामास पतङ्गानिव शीघ्रगान् |
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
शरौघान्विसृजन्पार्थो व्यचरत्कालवद्रणे ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
शरौघान्सम्यगस्यन्तो जीमूता इव वार्षिकाः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
शरौघान्सम्यगस्यन्तौ जीमूतौ सलिलं यथा ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
शरौघिणं पार्थिवान्मज्जय़न्तं; वेलेव पार्थमिषुभिः संसहिष्ये ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
शरौघिणीं धनुःस्रोतां वाहुपन्नगसङ्कुलाम् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
शरौघेणाप्रमेय़ेण त्वरमाणो जिघांसय़ा ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
शरौघैः पूरय़न्तौ तावाकाशं प्रदिशस्तथा |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
शरौघैर्विविधैस्तूर्णं माद्रीपुत्राववारय़न् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
शर्म तैः सह वा नोऽस्तु तव वा यच्चिकीर्षितम् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
शर्म नैवाधिगच्छामि चिन्तय़ानोऽनिशं विभो ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
शर्म वर्म प्रतिष्ठा च जीविताशा च सञ्जय़ ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
शर्मकान्वर्मकांश्चैव सान्त्वेनैवाजय़त्प्रभुः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
शर्मिष्ठा प्राक्षिपत्कूपे ततः स्वपुरमाव्रजत् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
शर्मिष्ठां मातरं चैव तस्याचख्युश्च दारकाः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
शर्मिष्ठाय़ाः सम्प्रसूतो दुहितुर्वृषपर्वणः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
शर्मिष्ठाय़ाः सुतं द्रुह्युमिदं वचनमव्रवीत् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
शर्मिष्ठाय़ाः सुतो द्रुह्युस्ततोऽनुः पूरुरेव च ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
शर्मिष्ठय़ा महाभाग दुहित्रा वृषपर्वणः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
देवय़ान्यु उवाच
शर्मिष्ठय़ा यदुक्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः |
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
शर्मिष्ठय़ा सेव्यमानां पादसंवाहनादिभिः ||
६ ग
आदि पर्व
अध्याय
७८
देवय़ान्यु उवाच
शर्मिष्ठय़ातिवृत्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
शर्यातितनय़ां वित्तं भार्यां च च्यवनस्य माम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
शर्यातिय़ज्ञे नासत्यौ कृतवान्सोमपीथिनौ |
११८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
शर्यातेर्यज्ञमाय़ान्तं यथेन्द्रं देवमश्विनौ ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
शर्वर्यन्तेषु जातानां तान्येवैभ्यो ददाति सः ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
शर्वर्यो दिवसाश्चैव मारीचः कश्यपस्तथा |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
शर्वस्य शास्त्रेषु तथा दश नामशतानि वै ||
७४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
शलं विनिहतं सङ्ख्ये भूरिश्रवसमेव च |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
शलभा इव राजानः पतन्ति विधिचोदिताः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
शलभा इव सम्पेतुः संवृण्वाना दिशो दश ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
शलभा इव सम्पेतुः समन्ताच्छरवृष्टय़ः ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
शलभा यत्र सौवर्णास्तपनीय़विचित्रिताः |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
शलभानां यथा व्रातैस्तद्वदासीत्समाकुलम् ||
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
शलभानामिव व्राताः शराः कर्णसमीरिताः ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
शलभानामिव व्रातैः पिशाचैरिव दुर्दृशैः ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
शलभानामिवाकाशे तदा भरतसत्तम ||
४५ ख