chevron_left  शरैराशीविषाकारैस्ततक्षातेarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
शरैराशीविषाकारैस्ततक्षाते परस्परम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
शरैरेकाय़नीकुर्वन्दिशः सर्वा यतव्रतः |
६१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
शरैरेकाय़नीकुर्वन्दिशः सर्वा यतव्रतः |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ३७
दुर्योधन उवाच
शरैरेनं सुनिशितैः पातय़िष्यामि भूतले ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
शरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैः पृथुभिः पार्थचोदितैः ||
१५ ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
अर्जुन उवाच
शरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैरहं पश्चाद्व्यनाशय़म् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
शरैर्घातय़तु क्षिप्रं समन्ताद्भरतर्षभ ||
७९ ख
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
शरैर्जघान सङ्क्रुद्धः कृतसञ्ज्ञोऽथ लक्ष्मणः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
शरैर्जघ्ने महावाहुं पार्थं कृष्णं च भारत ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
शरैर्दश दिशो राजंस्तेषां मुक्तैः सहस्रशः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
शरैर्दहन्तं सैन्यं मे ग्रीष्मे कक्षमिवानलम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पर्वताञ्जलदा इव ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पितामहमुपाद्रवत् ||
८४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
शरैर्निजघ्निवान्पार्थो महेन्द्र इव दानवान् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
जमदग्निरु उवाच
शरैर्निपातय़िष्यामि सूर्यमस्त्राग्नितेजसा ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
शरैर्निशितधाराग्रैः शात्रवाणामशातय़त् ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
शरैर्भृशं विव्यधतुर्नृपोत्तमौ; महावलौ शत्रुभिरप्रधृष्यौ ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
शरैर्भृशाय़स्ततनुः प्रविव्यथे; तथा यथा वज्रविदारितोऽचलः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
शरैर्ववर्षतुर्घोरैर्महामेघौ यथाचलम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
शरैर्वहुभिरभ्यर्छद्भीमसेनः शिलाशितैः ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वहुभिरानर्छत्कृतप्रतिकृतैषिणौ |
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वहुभिरानर्छत्पितरं ते जनेश्वर ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वहुभिरानर्छत्सिंहनादमथानदत् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वहुभिरानर्छद्दारय़न्निव सर्वशः ||
६५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वहुभिरानर्छद्भीमसेनं महावलम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वहुभिरुद्दिश्य पातय़ामास संय़ुगे ||
२७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वहुविधाकारैः शतशोऽथ सहस्रशः ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वहुविधै राजन्नाससाद पितामहम् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वहुविधैः सङ्ख्ये रुक्मपुङ्खैः सुवेगितैः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वहुविधैश्चैनमाचिनोत्परवीरहा |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
शरैर्विद्रावय़ामास भारद्वाजस्य पश्यतः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
शरैर्विध्वंसितांश्चोरानवजित्य च तद्धनम् ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
शरैर्विध्वंसय़ति वै नलिनीमिव कुञ्जरः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
शरैर्विभिन्नं भृशमुग्रवेगैः; कर्णात्मजं सोऽभ्यहनत्सुषेणम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
शरैर्विभुग्नं व्यसु तद्विवर्मणः; पपात कर्णस्य शरीरमुच्छ्रितम् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
शरैर्विभुग्नाङ्गनिय़न्तृवाहनः; सुदुःसहोऽन्यैः पटुशोणितोदकः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
शरैर्विव्याध गात्राणि राक्षसानां महावलः ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
शरैर्विशकलीकुर्वंश्चक्रे व्यश्वरथद्विपान् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
शरैर्विशकलीकुर्वन्दिक्षु सर्वास्वदृश्यत ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
शरैर्विशकलीकुर्वन्नमित्रानभ्यवीवृषत् |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वीक्ष्य वितुन्नाङ्गौ प्रहृष्टौ युद्धदुर्मदौ ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
शरैर्वैतस्तिकै राजन्नित्यमासन्नय़ोधिभिः |
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
शरैर्हतान्पातितांश्चैव रङ्गे; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
शरैश्च मेऽर्थो वहुभिरक्षय़ैः क्षिप्रमस्यतः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
शरैश्च वहुधा राजन्भीममार्च्छत्समन्ततः ||
६३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
शरैश्च वहुधा विद्धमस्त्रैश्च शकलीकृतम् |
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
शरैश्च वेगं सहसा निगृह्य; तस्याभितोऽभ्यापततो गजस्य |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
शरैश्च शतशो विद्धास्ते सङ्घाः सङ्घचारिणः |
४५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
शरैश्चकर्त वहुधा वहुभिर्गृध्रवाजितैः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
शरैश्चतुर्भिश्चतुरो निजघान महारथः ||
२० ख