द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
शरासनं शरांश्चैव गतासुः प्रमुमोच ह ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
शरासनधरः कश्चिद्यथा पार्थो धनञ्जय़ः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
शरासनधरांश्चैव गदाशक्तिधरांस्तथा |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
शरासनवरं घोरं शक्तिकण्टकसंवृतम् |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
शरासनादाधिरथेः प्रभवन्तः स्म साय़काः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
शरासनाद्विनिर्मुक्ताः संसक्ता यान्ति साय़काः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
शरासनानि धुन्वन्तः शरवर्षैरवाकिरन् ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
शरासनानि धुन्वानाः सिंहनादं प्रचक्रिरे ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
शरासनानि धुन्वानाः सिंहनादान्प्रचुक्रुशुः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
शरासिशक्त्यृष्टिगदापरश्वधै; र्नराश्वनागासुहरं भृशाकुलम् ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
शरास्तु कर्णार्जुनवाहुमुक्ता; विदार्य नागाश्वमनुष्यदेहान् |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
शरास्तय़ोश्च विवभुः कङ्कवर्हिणवाससः |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
शराहता भिन्नदेहा वद्धय़ोक्त्रा हय़ोत्तमाः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
शराहतानां पततां हय़ानां; वज्राहतानां पततां गजानाम् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
शरीरं कारु तस्यासीत्तत्स धीमाञ्शनैः शनैः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
यतिरु उवाच
शरीरं केवलं शिष्टं निश्चेष्टमिति मे मतिः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
शरीरं च जहात्येव निरुच्छ्वासश्च दृश्यते |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
शरीरं च मृतस्यैकं समवध्नन्त पाण्डवाः |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
शरीरं त्यजते जन्तुश्छिद्यमानेषु मर्मसु |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
शरीरं दोषवहुलं दृष्ट्वा चेदं विमुच्यते ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
शरीरं पुरमित्याहुः स्वामिनी वुद्धिरिष्यते |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
शरीरं यज्ञपात्राणि इत्येषा श्रूय़ते श्रुतिः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
शरीरं यस्य निर्देष्टुमशक्यं तु सुरासुरैः ||
१९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
युधिष्ठिर उवाच
शरीरं योक्तुमिच्छामि तपसोग्रेण भारत |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
शरीरं वर्जय़न्त्येते जीवितेन विवर्जितम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
शरीरं वासुदेवस्य रामस्य च महात्मनः |
२२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
शरीरं स्म तदा भाति स्रवन्निव महीधरः ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
अम्वो उवाच
शरीरकर्ता मातुर्मे सृञ्जय़ो होत्रवाहनः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
शरीरकृत्प्राणदाता यस्य चान्नानि भुञ्जते |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४३
युधिष्ठिर उवाच
शरीरगुप्त्याभ्यधिकं धर्मं गोपय़ पाण्डव ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
शरीरगृहसंस्थस्य शौचतीर्थस्य देहिनः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
शरीरगौरवात्तस्य शिला गात्रैर्विचूर्णिता ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
शरीरग्रहणं चास्य केन पूर्वं प्रकल्पितम् |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
शरीरग्रहणेऽन्यस्मिंस्तेषु क्षीणेषु सर्वशः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
शरीरजेनानुगतः सर्वगात्रातिगेन ह ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
काश्यप उवाच
शरीरतश्च निर्मुक्तः कथमन्यत्प्रपद्यते ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
शरीरदारुशृङ्गाटां भुजनागसमाकुलाम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
अष्टक उवाच
शरीरदेहादिसमुच्छ्रय़ं च; चक्षुःश्रोत्रे लभते केन सञ्ज्ञाम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
शरीरधातवो ह्यस्य मांसं रुधिरमेव च |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
शरीरनिय़मं ह्याहुर्व्राह्मणा मानुषं व्रतम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
शरीरन्यासमोक्षेण मनसा निर्मलेन च |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
शरीरपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
शरीरपीडास्तास्तास्तु देहत्यागो विवासनम् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ||
६६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
शरीरभृद्गार्हपत्यस्तस्मादन्यः प्रणीय़ते |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
शरीरमध्रुवं लोके सर्वेषां प्राणिनामिह ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
शरीरमनुपर्येति सर्वान्प्राणान्रुणद्धि वै ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
शरीरमपि राजेन्द्र तस्य कानिष्ठिकासमम् |
८ क