शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुश्रुत्यं तपस्त्यागः श्रद्धा यज्ञक्रिय़ा क्षमा |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुसंरम्भमेवेच्छन्नभिदुद्राव राक्षसम् ||
४० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
वाहुस्त्वनिन्दितः शर्वः शङ्करः शङ्करोऽधनः |
९९ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुस्वस्तिकविन्यस्तपीनह्रस्वशिरोधरम् |
६६ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुय़ुद्धं तय़ोरासीत्क्रुद्धय़ोर्नरसिंहय़ोः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
वाहुय़ुद्धं सुवलिनोः शक्रप्रह्रादय़ोरिव ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
वाहू चिच्छेद वै कर्णः शिरश्चैव सकुण्डलम् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
भीम उवाच
वाहू ते सम्प्रधक्ष्यामि सहदेवाग्निमानय़ ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
वाहू दर्शय़मानो हि वाहुद्रविणदर्पितः |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
वाहू दिधक्षन्वारितः फल्गुनेन; किं दुष्कृतं भीम तदाभविष्यत् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
वाहू धनुः शिरश्चोर्व्यां स्मय़मानोऽभ्यपातय़त् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
वाहू धरण्यां निष्पिष्य मुहुर्मत्त इव द्विपः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
वाहू पर्वतसङ्काशावाय़तावय़ुतं समौ |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वाहू प्रसार्याभिमुखो धर्मराजस्य मद्रराट् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
वाहू महान्तौ कृत्वा तु तथास्यं च भय़ानकम् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
वाहू विशालौ कृत्वा तु तेन भीमोऽपि गच्छति |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
वाहू विशालौ कृत्वा तु भीमो गच्छति पाण्डवः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
वाहूंश्च वीरो वीराणां चिच्छेद लघु चेषुभिः ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वाहूंश्चिच्छेद च तथा साय़ुधान्केतनानि च |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
वाहून्क्षुरैरमित्राणां विचकर्तार्जुनो रणे ||
५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
वाहून्परिघसङ्काशान्संस्पृशन्तः शनैः शनैः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
वाहूपधानं शाम्यन्तं तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
वाहूपधानं शाम्यन्तं प्रशंसन्ति दिवौकसः ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
वाहूरुचरणानन्यान्विशिखोन्मथितान्पृथक् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
वाहोः पुत्रेण राज्ञा च सगरेणेह धीमता |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
वाह्यं जनं भेदय़ित्वा भोक्तव्यो मध्यमः सुखम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
वाह्यं मृत्युभय़ं कृत्वा तावकाः पाण्डवान्ययुः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
वाह्यं मृत्युभय़ं कृत्वा प्रत्यतिष्ठन्परान्युधि ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
वाह्यं वर्णं जनय़ति चातुर्वर्ण्यविगर्हितम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
वाह्यकर्णो हस्तिपदस्तथा मुद्गरपिण्डकः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
वाह्यकुण्डो मणिर्नागस्तथैवापूरणः खगः |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
वाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेषु च गृध्यतः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
वाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेषु च गृध्यतः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
वाह्यमाभ्यन्तरं चैव चरन्तौ मार्गमुत्तमम् |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
वाह्यमाभ्यन्तरं चैव पौरजानपदं जनम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२९
भीष्म उवाच
वाह्यश्चेद्विजिगीषुः स्याद्धर्मार्थकुशलः शुचिः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
वाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
वाह्या वाह्यैस्तु जाय़न्ते यथावृत्ति यथाश्रय़म् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
वाह्यानन्यानपेक्षन्ते गुणांस्तानपि मे शृणु |
१०१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
वाह्यान्कुर्यान्नरश्रेष्ठ दोषाय़ स्युर्हि तेऽन्यथा ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
वाह्यान्तरनिपातश्च निर्विशेषमदृश्यत ||
६४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
वाह्यान्तराणां शत्रूणां स्वभावं पश्य भारत |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
वाह्याभ्यन्तरभूतानां स्वभावं पश्य भारत |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
वाह्याश्च मैत्रीं कुर्वन्ति तेषु सङ्घातवृत्तिषु ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
वाह्याश्चागन्तवो येऽन्ये यक्षराक्षसपन्नगाः ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
वाह्ये चाभ्यन्तरे चैव कर्मणा मनसि स्थितः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
वाह्येन सेनामभ्येत्य जग्मतुः सव्यसाचिनम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
वाह्लिकं च त्रिभिर्वाणैरभ्यविध्यत्स्तनान्तरे |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
वाह्लिकः प्रतिसंय़त्तः पराक्रान्तमवारय़त् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
वाह्लिका दरदाश्चैव प्राच्योदीच्याश्च मालवाः |
१०९ क