द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
वलिनं सत्यकर्माणमदीनमपराजितम् |
३१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
वलिनः कृतिनो नित्यं स च पापात्मवान्नृप ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
वलिनश्च रणे कृष्ण नैवाशाम्यत वैशसम् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
धृतराष्ट्र उवाच
वलिना देवकल्पेन गुर्वर्थे व्रह्मचारिणा ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
वलिना देवकल्पेन गुर्वर्थे व्रह्मचारिणा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
वलिना विगृहीतस्य कुतो राज्यं कुतः सुखम् ||
१०७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
वलिना विग्रहो राजन्न कथञ्चित्प्रशस्यते |
१०७ क
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
वलिना वीर्यमत्तेन हृतामेभिर्महात्मभिः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
वलिना संनिविष्टस्य शत्रोरपि परिग्रहः |
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
वलिनां दुर्वलानां च ह्रस्वानां महतामपि ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
भीष्म उवाच
वलिनां दुर्वलानां च ह्रस्वानां महतामपि ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
वलिनार्जुनकालेन नीतोऽस्तं कर्णभास्करः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
वलिनो घोषिणो दान्ताः सैन्धवाः साधुवाहिनः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
वलिनोः संय़ुगे राजन्वृत्रवासवय़ोरिव ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
वलिनौ मतिमन्तौ च सङ्घातं चाप्युपागतौ |
११३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
वलिनौ युगपन्मत्तौ स्पर्धय़ा च वलेन च ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
वलिनौ वारणौ यद्वद्वाशितार्थे मदोत्कटौ ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
वलिनौ समरे शूरावन्योन्यसदृशावुभौ ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
वलिनौ स्पर्धिनौ वीरौ कुलजौ वाहुशालिनौ |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
वलिभिः पाण्डवैर्दृप्तैर्लव्धलक्षैः प्रहारिभिः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
वलिभिः पाण्डवैर्वीरैर्लव्धलक्षैर्भृशार्दिता ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
वलिभिर्दृप्तशार्दूलैरादित्योऽभिनिरीक्ष्यते ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
वलिभिर्विविधैश्चापि पूजय़ामास तं द्विजः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
वलिमादाय़ विविधं द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
वलिर्वैरोचनिर्वद्धो धर्मपाशेन दैवतैः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
वलिर्वैरोचनो राजा नरकः पृथिवीञ्जय़ः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
वलिर्हि राजा पारमविन्दमानो; नान्यत्कालात्कारणं तत्र मेने ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
वलिवासवसंवादं पुनरेव युधिष्ठिर ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
वलिषड्भागमुद्धृत्य वलिं तमुपय़ोजय़ेत् |
९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
वलिषष्ठेन शुल्केन दण्डेनाथापराधिनाम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
वलिस्तु यजते यज्ञमश्वमेधं महीं गतः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
वलिहोमनमस्कारैर्मन्त्रैश्च भरतर्षभ |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
वलिहोमार्चितं दिव्यं सुसंमृष्टानुलेपनम् |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
वली भीमः समर्थश्च कृती राजा सुय़ोधनः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
वली शूरो महेष्वासो मित्राणामभय़ङ्करः ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
वलीनां सम्यगादानाद्धर्मतश्चानुशासनात् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
वलीपलितसंय़ोगं कार्श्यं वैवर्ण्यमेव च |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
वलीवर्दो मृतश्चापि जाय़ते व्रह्मराक्षसः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यदुरु उवाच
वलीसन्ततगात्रश्च दुर्दर्शो दुर्वलः कृशः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
वलीय़ः सर्वतो दिष्टं पुरुषस्य विशेषतः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
वलीय़सां मनुष्याणां त्यजत्यात्मानमन्ततः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
गण्डो उवाच
वलीय़ांसो दुर्वलवद्विभेम्यहमतः परम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
भीष्म उवाच
वले केय़मपक्रान्ता रोचमाना शिखण्डिनी |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
वले नय़श्च संय़ुक्तः सदा पञ्चविधात्मकः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
भीम उवाच
वले पराक्रमे युद्धे शक्तोऽहं तव निग्रहे ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
वले प्रतिष्ठितो धर्मो धरण्यामिव जङ्गमः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मधुकैटभावू ऊचतुः
वले रूपे च वीर्ये च शमे च न समोऽस्ति नौ |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
वले विष्णुसमश्चासीत्तेजसा भास्करोपमः |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
वले वीर्ये च सदृशस्तेजसा चैव तेऽनघ |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३९
युधिष्ठिर उवाच
वलेः कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः ||
५ ख