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शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
वलाधिकाय़ राजेन्द्र तद्दृष्टं त्वय़ि शत्रुहन् ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
वलानां मथ्यमानानां श्रुत्वा निनदमुत्तमम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
वलानां हर्षणं नित्यं प्रजानामन्ववेक्षणम् |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
वलानि च कुरुश्रेष्ठ भवन्त्येषां यथेच्छकम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
वलानि तेषां वीराणामागच्छन्ति ततस्ततः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
वलानि दूषय़ेदस्य जानंश्चैव प्रमाणतः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
वलानि योगे प्रोक्तानि मय़ैतानि विशां पते |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
वलानीकं जय़ानीकं जय़ाश्वं चाभिजघ्निवान् |
१२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
वलानीको जय़ानीको जय़ाश्वो रथवाहनः ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
वलान्निजग्राह किरीटमाली; पदेऽथ राजन्दशमे कथञ्चित् ||
९८ ख
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
वलान्निय़ुक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा; मनीषिणां पाण्डवानां सकाशम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
वलान्नीतास्मि रुदती विद्राव्य पृथिवीपतीन् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
वलान्यतिवलं प्राप्य नवलानि भवन्ति वै ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
वलान्विताः शीलवय़ोपपन्नाः; सर्वाः प्रशंसन्ति सुगन्धवत्यः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
वलान्विताः शीलवय़ोपपन्नाः; सर्वाः प्रशंसन्ति सुगन्धवत्यः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
वलान्वितान्वत्सतरान्निर्व्याधीनेकविंशतिम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
वलान्विताश्चाप्यपरे ह्यनृत्य; न्नन्योन्यमाश्लिष्य नदन्त ऊचुः ||
२८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
वलार्णवौ ततस्तौ तु समेय़ातां निशामुखे |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
वलार्थमूलं व्युच्छिद्येत्तेन नन्दन्ति शत्रवः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
वलावलं च मन्त्राणां व्राह्मणस्य च वाग्वलम् |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
वलावलं तथा सम्यक्चतुर्दश परीक्षसे ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
वलावलं विनिश्चित्य तप एव परं वलम् ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
वलावलममित्राणां श्रोतुमिच्छामि कौरव |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
भीष्म उवाच
वलावलममित्राणां स्वेषां च यदि पृच्छसि ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
वलावले विनिश्चित्य याथातथ्येन वुद्धिमान् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
वलास्त्रसर्गोत्तमय़त्नमन्युभिः; शरेण मूर्ध्नः स जहार सूतजः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
वलाहकं मेघपुष्पं सैन्यं सुग्रीवमेव च |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
वलाहकः कर्णभुजेरितस्ततो; हुताशनार्कप्रतिमद्युतिर्महान् |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
वलाहकाग्रे सूर्यो वा य एष प्रमुखे स्थितः ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय ४०
उत्तर उवाच
वलाहकादपि मतः स जवे वीर्यवत्तरः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
वलाहकादुच्चरन्तीव विद्यु; त्सहस्रघ्नी द्विषतां सङ्गमेषु |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
वलाहकेनेव यथा वलाहको; यदृच्छय़ा वा गिरिणा गिरिर्यथा |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ५१
सूत उवाच
वलाहकैश्चाप्यनुगम्यमानो; विद्याधरैरप्सरसां गणैश्च ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
वलिं च कृत्वा हुत्वा च देवतां चाप्यपूजय़त् ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
वलिं च कृत्स्नमादाय़ द्वारि तिष्ठति वारितः ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
वलिं च कृत्स्नमादाय़ द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
वलिं च कृत्स्नमादाय़ द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
वलिं च कृत्स्नमादाय़ पाण्डवेभ्यो न्यवेदय़त् ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
वलिं च कृत्स्नमादाय़ भरुकच्छनिवासिनः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
वलिं चैव करिष्यामि पातालतलवासिनम् ||
७६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
वलिं वद्ध्वा महादैत्यं शक्रो देवाधिपः कृतः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
वलिं वैरोचनिं वज्री ददर्शोपससर्प च ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २५६
भीमसेन उवाच
वलिं स्वय़ं प्रत्यगृह्णात्प्रीय़माणस्त्रिलोचनः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
वलिः किलोपह्रिय़ते तस्य देवस्य तैर्नरैः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय २९
द्रौपद्यु उवाच
वलिः पप्रच्छ दैत्येन्द्रं प्रह्लादं पितरं पितुः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
वलिः सुदेष्णां भार्यां च तस्मै तां प्राहिणोत्पुनः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
वलिकर्म च यच्चान्यदुत्सेकाश्च पृथग्विधाः |
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
वलिकर्मसु वक्ष्यामि गुणान्कर्मफलोदय़ान् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
वलिकर्मोपहारश्च स्कन्दस्येज्या विशेषतः ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय १४१
हिडिम्व उवाच
वलिनं मन्यसे यच्च आत्मानमपराक्रमम् |
१४ क