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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
वरासिना वाजिरथाश्वकुञ्जरां; स्तथा रथाङ्गैर्धनुषा च हन्त्यरीन् |
७६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
वरासिशक्त्यृष्टिवरूथचर्मणां; विभूषणानां च समाक्षिपन्प्रभाम् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
वराहः सिन्धुराजस्य पपाताग्निशिखोपमः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
वराहः सिन्धुराजस्य राजतोऽभिविराजते |
२० क
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
वराहकर्णः सान्द्रोष्ठः फलभक्षः फलोदकः |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
उत्तर उवाच
वराहकर्णव्यामिश्रः शरान्धारय़ते दश ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
वराहकर्णैः सविषाणशृङ्गैः; क्षुरप्रवर्षैश्च विनेदतुः खम् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
वराहकर्णैर्दशभिरविध्यदसिचर्मणी ||
६५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
वराहकर्णैर्नाराचैर्नालीकैर्निशितैः शरैः |
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
वराहकर्णैर्नालीकैस्तीक्ष्णैश्चापि विकर्णिभिः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५२
सूत उवाच
वराहको वारणकः सुमित्रश्चित्रवेदिकः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
वराहखरभग्नास्थिकपालघटसङ्कुलम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
वराहनानामृगपक्षिजुष्टं; महद्वनं चैत्ररथप्रकाशम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
वराहपर्वते विप्र दत्त्वा पिण्डान्सविस्तरान् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
वराहमृगसत्त्वाश्च गजसत्त्वास्तथापरे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
वराहरूपिणं देवमधृष्यममरैरपि ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
वराहरूपिणा चान्तर्विक्षोभितजलाविलम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
वराहश्चैव सिंहश्च त्रिविक्रमगतिः प्रभुः ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
वराहसंस्थितं भूतं मत्समीपमुपागमत् ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
वराहाणां च यूथेषु संश्रय़त्सु जलाशय़ान् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २५१
द्रौपद्यु उवाच
वराहान्महिषांश्चैव याश्चान्या मृगजातय़ः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
वराहोऽग्निर्वृहद्भानुर्वृषणस्तार्क्ष्यलक्षणः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
वराय़ सौम्यवक्त्राय़ पशुहस्ताय़ वर्षिणे |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
वराय़ुधान्पाणिगतान्करैः सह; क्षुरैर्न्यकृन्तंस्त्वरिताः शिरांसि च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
वरिष्ठं च गरिष्ठं च क्रोधे वैवस्वतं यथा ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
वसिष्ठ उवाच
वरिष्ठत्वाच्च वासाच्च वसिष्ठ इति विद्धि माम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
वरिष्ठमिन्द्रकर्माणं द्रोणं स्वकुलवर्धनम् ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
वरिष्ठा सहलोक्या च केशवस्य भविष्यसि ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
व्रह्मो उवाच
वरिष्ठो भविता जन्तुः शून्यागारे शचीपते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
वरिष्यमाण इन्द्रोतं शौनकं संशितव्रतम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
शल्य उवाच
वरुणं कोऽम्भसा हन्यादिन्धनेन च पावकम् |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
कण्व उवाच
वरुणं गच्छता द्रष्टुं समागच्छद्यदृच्छय़ा ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
वरुणं च कुवेरं च सभाय़ां पर्युपासते ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
वरुणं च धनेशं च धर्मराजं च पाण्डव |
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
वरुणं देवताः सर्वाः समेत्येदमथाव्रुवन् ||
५ ग
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
वरुणं देवराजं च यथास्थानमवस्थितम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
वरुणं पावकं चैव कृपं द्रोणं च माधवम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
वरुणं वाय़ुमादित्यं पर्जन्यं जातवेदसम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
वरुणः पाशभृच्चापि कुवेरो वा गदाधरः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
वरुणः पाशभृद्वापि सगदो वा धनेश्वरः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
वरुणः सह गौर्या च सह ऋद्ध्या धनेश्वरः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
वरुणः सागरे यत्तो नित्यं रक्षति दानवान् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
वरुणश्च ददौ तस्मै गदामशनिनिःस्वनाम् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११५
नारद उवाच
वरुणश्च यथा गौर्यां यथा चर्द्ध्यां धनेश्वरः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
वरुणश्चादितो विप्र जग्राह प्रभुरीश्वरः |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
वरुणश्चेश्वरो देवो लभतां काममीप्सितम् ||
३१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
वरुणस्त्वव्रवीत्प्रीतो ददाम्यस्मै वरं हितम् |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
महेश्वर उवाच
वरुणस्य ततो गौरी सूर्यस्य च सुवर्चला |
४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
वरुणस्य तथा लोकान्विविशुः पुरुषर्षभाः ||
२४ ख