वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मर्षे कथ्यतां यत्ते पाण्डवेषु विवक्षितम् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४०
भीष्म उवाच
व्रह्मर्षे किञ्चिदाश्चर्यमस्ति दृष्टं त्वय़ानघ ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
व्रह्मर्षे तत्फलं प्राप्तुं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मर्षे तव पुत्रोऽय़ं त्वद्भक्त्या धारितो मय़ा ||
१२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
विपुल उवाच
व्रह्मर्षे मिथुनं किं तत्के च ते पुरुषा विभो |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
व्रह्मर्षे विदितश्चासि विषय़ान्तमुपागतः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मर्षे श्रूय़तां यत्ते मनसैतद्विवक्षितम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
व्रह्मर्षेश्च भरद्वाजाद्द्रोण्यां द्रोणो व्यजाय़त |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मर्षय़श्च विजय़ं जेपुः पार्थस्य धीमतः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
व्रह्मर्षय़श्च ससुतास्तथा देवर्षय़श्च वै ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
व्रह्मर्षय़श्च सिद्धाश्च समाजग्मुर्महामृधे ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
व्रह्मर्षय़ो विमानस्था व्रह्मलोकगताश्च ये |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मलोकं गते द्रोणे धृष्टद्युम्ने च मोहिते ||
४१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मलोकं गतो राजन्व्राह्मणो वेदपारगः ||
९४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
व्रह्मलोकं गुरोर्वृत्त्या नित्यमेव चरिष्यसि ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्मलोकं च कौन्तेय़ गोलोकं च सनातनम् |
६८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
व्रह्मलोकं महापुण्यं सोमलोकं च शाश्वतम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
व्रह्मलोकं व्रजेद्राजन्पुनीते च कुलं नरः ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
व्रह्मलोकगताः शूरा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
व्रह्मलोकगताः सिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
व्रह्मलोकगताश्चैव कथय़न्ति महर्षय़ः |
६४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मलोकजितः सर्वे तपसा व्रह्मवादिनः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
व्रह्मलोकजितः स्वर्ग्यान्वीरांस्तान्मनुरव्रवीत् ||
२९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मलोकपरा भूत्वा प्रार्थय़न्तो जय़ं युधि |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मलोकपरा भूत्वा सञ्जग्मुः क्रोधमूर्छिताः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मलोकपराः सर्वे समपद्यन्त भारत ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
व्रह्मलोकपरिभ्रष्टः शूद्रः समुपजाय़ते ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मलोकप्रतीकाशमाश्रमं सोऽभिवीक्ष्य च |
३० क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
व्रह्मलोकमवाप्नोति सुकृती विरजा नरः ||
९६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
व्रह्मलोकश्च लोकानां गतीनां मोक्ष उच्यसे ||
१६० ख
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मलोकसमं पुण्यमासीद्द्वैतवनं सरः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मलोकस्थमात्मानं मेने स नृपसत्तमः ||
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मलोकाच्च दुर्धर्षः सोऽस्माभिः पूजितोऽभवत् ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मलोकाच्च्युताः सर्वे सर्वे च व्रह्मवादिनः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मलोकादपक्रान्ता सप्तधा प्रतिपद्यते ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
व्रह्मलोकादय़ं चैव स्तवराजोऽवतारितः ||
२१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
व्रह्मलोके च तिष्ठन्ति ज्वलमानाः श्रिय़ान्विताः |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
व्रह्मलोके निवासं यो ध्रुवं समभिकाङ्क्षति ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
व्रह्मलोके वसन्त्येताः सोमेन सह भारत |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मवक्त्राय़ शर्वाय़ शङ्कराय़ शिवाय़ च ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४९
व्राह्मण उवाच
व्रह्मवध्या परं पापं निष्कृतिर्नात्र विद्यते |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
व्रह्मवध्या महान्दोष इत्याहुः परमर्षय़ः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४९
व्राह्मण उवाच
व्रह्मवध्यात्मवध्या वा श्रेय़ आत्मवधो मम ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रह्मवध्यावलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
व्रह्मवन्धुश्चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
व्रह्मवर्चसहीनस्य स्वाध्याय़विरतस्य च |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
व्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जाय़न्ते तस्य वेश्मनि ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
व्रह्मवह्निर्मम वलं भक्ष्यामि समय़ं क्षुधा ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
व्रह्मवादी गुरुर्यस्मात्तपस्वी व्राह्मणश्च सन् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
व्रह्मवाय़्वग्निसोमानां सालोक्यमुपय़ाति सः ||
६२ ख