वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रवीषि यदिदं कर्ण सर्वं मे मनसि स्थितम् |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
५५
कर्ण उवाच
व्रवीषि वाचा यत्पार्थ कर्मणा तत्समाचर |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्राह्मण उवाच
व्रवीषि सूनृतं धर्मं यस्य वक्ता न विद्यते |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रवीहि तत्त्वेन महानुभावः; कोऽसौ विजेता दुहितुर्ममाद्य ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४१
धृतराष्ट्र उवाच
व्रवीहि विदुर त्वं मे पुराणं तं सनातनम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
व्रवीह्यतिमतिं त्वां हि वाक्यैरनुमिमीमहे ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्म क्षत्रेण संसृष्टं क्षत्रं च व्रह्मणा सह |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१८३
सनत्कुमार उवाच
व्रह्म क्षत्रेण सहितं क्षत्रं च व्रह्मणा सह |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
व्रह्म च क्षत्रिय़ो द्वेष्टि तदा सीदन्ति ते त्रय़ः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
व्रह्म च व्राह्मणत्वं च येन त्वाहमचूचुदम् ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
व्रह्म चाव्ययमाप्नोति हित्वा देहमशाश्वतम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
व्रह्म चैतत्पुरा सृष्टं ये न जानन्त्यतद्विदः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
व्रह्म तत्परमं वेद्यममृतं ज्योतिरक्षरम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
व्रह्म तेजोमय़ं शुक्रं यस्य सर्वमिदं जगत् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
व्रह्म तेजोमय़ं शुक्रं यस्य सर्वमिदं रसः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
व्रह्म धारय़तां नित्यं व्रतानि निय़मांस्तथा ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्म पर्यचरत्क्षत्रं विशः क्षत्रमनुव्रताः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
व्रह्म प्राप्नोति सोऽत्यन्तमसङ्गेन च गच्छति ||
५० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
व्रह्म मृत्युश्च तौ राजन्नात्मन्येव व्यवस्थितौ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
व्रह्म यत्तं निवसति देहवत्सु; तस्माद्विद्याद्व्यवसाय़ं प्रभूतम् ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
अर्जुन उवाच
व्रह्म यत्परमं वेद्यं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्म वक्त्रं भुजौ क्षत्रं कृत्स्नमूरूदरं विशः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
व्रह्म वक्त्रं भुजौ क्षत्रमूरू मे संश्रिता विशः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
व्रह्म वर्धय़ति क्षत्रं क्षत्रतो व्रह्म वर्धते ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रह्म वेदाश्च वेद्यं च त्वय़ा सृष्टं महाद्युते ||
११ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
व्रह्म सत्यं तपः सत्यं सत्यं चैव प्रजापतिः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
व्रह्म सत्यं दमः शौचं धर्मो ह्रीः श्रीर्धृतिः क्षमा |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मं तेजस्तदाजय़्यं मन्यमानो महारथः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
व्रह्मकन्यानिवेशे च सर्वभूतमनोहरे |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
व्रह्मकल्पे पुरा व्रह्मन्व्रह्मर्षीणां समागमे |
६ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वृहदश्व उवाच
व्रह्मकल्पैर्द्विजाग्र्यैश्च तस्मान्नार्हसि शोचितुम् ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
व्रह्मक्षत्रं वैश्यवर्णं च शूद्रः; क्रमेणैतान्न्याय़तः पूजय़ानः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
व्रह्मक्षत्रं सम्प्रविशेद्वहु कृत्वा सुदुष्करम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
व्रह्मक्षत्रं हि सर्वेषां धर्माणां मूलमुच्यते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
मान्धातो उवाच
व्रह्मक्षत्रप्रसूताश्च वैश्याः शूद्राश्च मानवाः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
व्रह्मक्षत्रमिदं सृष्टमेकय़ोनि स्वय़म्भुवा |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
व्रह्मक्षत्रविरोधेन भविता कुलसङ्करः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मक्षत्रविशां शूद्रा विहिताः परिचारकाः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मक्षत्रस्य विहिताः सूता वै परिचारकाः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
व्रह्मक्षत्रस्य संमानात्प्रजाः सुखमवाप्नुय़ुः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मक्षत्रादय़स्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मक्षत्रानुरक्ताश्च शूद्राः पर्यचरन्विशः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
व्रह्मक्षत्रान्तरे सूतं जातं मां विद्धि भार्गव ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३०
मतङ्ग उवाच
व्रह्मक्षत्राविरोधेन पूजां च प्राप्नुय़ामहम् |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
व्रह्मक्षत्रे च विहिते व्रह्मतेजो विशिष्यते ||
२७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
व्रह्मक्षत्रे त्रिरात्रं तु विहितं कुरुनन्दन |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
व्रह्मक्षत्रे हि मन्त्रोक्ता वैश्यस्य च युधिष्ठिर ||
३९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
युधिष्ठिर उवाच
व्रह्मक्षत्रेण निय़माश्चर्तव्या इति नः श्रुतम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
व्रह्मक्षेत्रं महापुण्यमभिगच्छन्ति भारत ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
व्रह्मक्षेत्रं सदा पुण्यं प्लक्षः प्रथमजः स्मृतः ||
१० ख