chevron_left  व्रतवन्तोarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
उमो उवाच
व्रतवन्तो नराः केचिच्छ्रद्धादमपराय़णाः |
५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २६
व्राह्मण उवाच
व्रतवारी सदैवैष य इन्द्रिय़जय़े रतः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
व्रतस्था च शरीरं त्वं यदि नाम विमोक्ष्यसि |
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
व्रतस्थे निय़मोपेते यथा वर्ताम्यहं त्वय़ि ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रतस्य व्रतकालं स यथोक्तं प्रत्यगृह्णत |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
व्रताग्निहोत्रं वेदाश्च ये चान्ये धर्मनिश्चय़ाः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
व्रताधिपः परं व्रह्म मुक्तानां परमा गतिः ||
१४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
युधिष्ठिर उवाच
व्रतानां किं फलं प्रोक्तं कीदृशं वा महाद्युते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
व्रतानां धारणं तुल्यं दर्शनं न समं तय़ोः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
व्रतावसाने सुशुभान्नरान्ददृशिरे वय़म् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
व्रतिनां चापि यो धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
व्रतिनां धर्मशीलानां गुरुशुश्रूषिणामपि |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
व्रतिनो निय़मस्थाश्च ये विप्राः श्रुतसंमताः |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
व्रतिभिर्वहुभिः कीर्णं तापसैरुपशोभितम् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
व्रतैश्च निय़मैश्चैव काले काले स्म भुञ्जते ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रतैश्च निय़मैश्चैव तपसा च तपोधन |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
व्रह्मो उवाच
व्रतैश्च विविधैः पुण्यैस्तथा तीर्थानुसेवनात् |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
व्रतैश्च विविधैर्युक्तास्तान्नमस्यामि माधव ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
व्रतैश्च विविधैर्व्रह्मन्स्वाध्याय़ैश्चानृणोऽभवत् ||
४१ ग
वन पर्व
अध्याय २८०
श्वशुरावू ऊचतुः
व्रतो यथोपदिष्टोऽय़ं यथावत्पारितस्त्वय़ा |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
व्रतोपनय़नाभ्यां वा उपवासेन वा द्विजः |
१३४ क
वन पर्व
अध्याय २८०
सत्यवानु उवाच
व्रतोपवासक्षामा च कथं पद्भ्यां गमिष्यसि ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
व्रतोपवासैर्वहुभिः कृतं भवति भीष्म यत् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
व्रवीति तच्चामुत विप्रपूर्वा; त्तच्चापि सर्वं मम दुर्योधनेऽस्ति ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
व्रवीति मधुरं कञ्चित्प्रिय़ो मे ह भवानिति |
१४४ क
आदि पर्व
अध्याय १८७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रवीतु नो भवान्सत्यं सन्देहो ह्यत्र नो महान् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
भीष्म उवाच
व्रवीतु भगवांस्तन्मे उपसन्नोऽस्म्यधीहि भोः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
युधिष्ठिर उवाच
व्रवीतु भगवानेतत्क्व ते गच्छन्ति तादृशाः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
राजो उवाच
व्रवीतु भगवानेतत्त्वं हि धर्मार्थदर्शिवान् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
व्रवीतु भगवानेतद्यदि गुह्यं न तन्मय़ि ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
राजपुत्र उवाच
व्रवीतु भगवान्नीतिमुपपन्नोऽस्म्यहं प्रभो |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
नहुष उवाच
व्रवीतु भगवान्मूल्यं महर्षेः सदृशं भृगोः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
युधिष्ठिर उवाच
व्रवीतु मे भवानेतत्सन्तोऽसन्तश्च कीदृशाः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
युधिष्ठिर उवाच
व्रवीतु वदतां श्रेष्ठो निशा समतिवर्तते ||
३६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय २
वलदेव उवाच
व्रवीतु वाक्यं प्रणिपातय़ुक्तं; कुन्तीसुतस्यार्थकरं यथा स्यात् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
व्रवीमि ते सत्यमिदं श्रद्दधस्व च जाजले ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
तुलाधार उवाच
व्रवीमि यत्तु वचनं तच्छृणुष्व द्विजोत्तम ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
व्रवीमि यदहं देवास्तत्सर्वं क्रिय़तामिह |
२८ क
वन पर्व
अध्याय ३५
युधिष्ठिर उवाच
व्रवीमि सत्यं कुरुसंसदीह; तवैव ता भारत पञ्च नद्यः ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
व्रवीमि सत्यं कौरव्य न मिथ्यैतत्कथञ्चन ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
व्रवीमि सत्यमेतच्च यथाहं पाण्डुनन्दन |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
व्रवीमि हन्त ते नीतिं राज्यस्य प्रतिपत्तय़े ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
शल्य उवाच
व्रवीम्यतः क्लीववत्त्वां युद्धादन्यत्किमिच्छसि ||
७८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
व्रवीम्यहं न कार्पण्यान्नार्थहेतोः कथञ्चन |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
च्यवन उवाच
व्रवीम्यहं व्रूहि वा त्वं च्यवनात्क्षत्रिय़ं वरम् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
व्रवीम्यहं व्रूहि वा त्वं वसिष्ठात्क्षत्रिय़ं वरम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
व्रवीम्यहं व्रूहि वा त्वमगस्त्यात्क्षत्रिय़ं वरम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
व्रवीम्यहं व्रूहि वा त्वमत्रितः क्षत्रिय़ं वरम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
व्रवीम्यहं व्रूहि वा त्वमुतथ्यात्क्षत्रिय़ं वरम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
नारद उवाच
व्रवीम्येष स्वय़ं वाय़ोस्तव दुर्भाषितं वहु ||
३३ ख