द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
व्युष्टाय़ां तु वरारोहे रजन्यां पापकर्मकृत् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
व्युष्टिं व्राह्मणपूजाय़ां दृष्टव्युष्टिर्महाव्रतः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
व्युष्टिं व्राह्मणपूजाय़ां रौक्मिणेय़ निवोध मे |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
व्युष्टिरेषा परा स्त्रीणां पूर्वं भर्तुः परा गतिः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
व्युष्टिर्भवति या पुंसां न सा क्रतुशतैरपि ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
व्यूढं दृष्ट्वा तु तत्सैन्यं सव्यसाची परन्तपः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
व्यूढं दृष्ट्वा महाघोरं पार्थेनामिततेजसा ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
व्यूढप्रहरणोरस्कं सैन्यं तत्समवृंहय़त् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
व्यूढमेवं यथान्याय़मेवं वहु च सञ्जय़ ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
व्यूढमेवं यथाशास्त्रममोघं चैव सञ्जय़ ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
व्यूढानि व्यूहविदुषा गाङ्गेय़ेन महात्मना ||
३३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढानीकः सभाद्वारमुपतिष्ठस्व दंशितः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
व्यूढानीकस्ततो द्रोणः पाण्डवानां महाचमूम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
व्यूढानीकस्ततो द्रोणो युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढानीका व्यतिष्ठन्त गन्धमादनवासिनः ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
व्यूढानीकानि सैन्यानि यत्ताः परमधन्विनः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढानीकान्महाराज जवेनैव महाहवे |
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
व्यूढानीकैरनुवलैर्नोपेय़ाद्वलवत्तरम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढे देवासुरे युद्धे हत्वा दैतेय़दानवान् |
९० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढे देवासुरे युद्धेऽभ्युद्यतेष्वाय़ुधेषु च ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढोत्तरांसान्पृथुलोहिताक्षा; न्नेमान्स्म पृच्छन्स शृणोति नूनम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
व्यूढोरस्कं ततो भीमः पातय़ामास पार्थिव |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढोरस्कं महावाहुं प्रेक्षन्त्या निहतं पतिम् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
व्यूढोरस्का दीर्घभुजाः प्रांशवः प्रिय़दर्शनाः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढोरस्कान्मागधानां विस्मय़ः समजाय़त ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
व्यूढोरस्को महावाहुरनिवर्ती वरप्रणुत् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
व्यूढोरस्को महावाहुर्नकुलो यक्ष जीवतु ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढोरस्को महावाहुस्ताम्रास्यो मितभाषिता ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
व्यूढोरस्को महास्कन्धो मत्तद्विरदविक्रमः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ तथा मुष्कचतुष्किणौ ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ निय़ुद्धकुशलावुभौ |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ निय़ुद्धकुशलावुभौ |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
व्यूहं चाव्यूहत महत्सर्वतोभद्रमाहवे ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
व्यूहं तं पूरय़ामासुर्व्यूहशास्त्रविशारदाः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
व्यूहं दृष्ट्वा तु तत्सैन्यं पिता देवव्रतस्तव |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
व्यूहं दृष्ट्वा सुपर्णं तु भारद्वाजकृतं तदा |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूहं प्रतिव्यूह्य शिरांसि भित्त्वा; लोकक्षय़ं पश्यत भीमसेनात् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
व्यूहं भीष्मेण चाभेद्यं कल्पितं प्रेक्ष्य पाण्डवः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
व्यूहं महामेघसमं महात्मा; ददर्श दूरात्कपिराजकेतुः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
व्यूहं व्यूह महावाहो मकरं शत्रुतापनम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
व्यूहं व्यूह्य महेष्वासो माकरं शत्रुतापनः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
व्यूहः क्रौञ्चारुणो नाम सर्वशत्रुनिवर्हणः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
व्यूहः स चक्रशकटो भारद्वाजेन निर्मितः ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यूहतः समरे तात मत्स्यराजं परीप्सतः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
व्यूहप्रमुखतस्तेषां तस्थतुः पुरुषर्षभौ |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
व्यूहमध्ये स्थितो राजन्पाण्डवान्प्रति भारत ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
व्यूहमानो मय़ा द्रोणो दिव्येनास्त्रेण संय़ुगे |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
व्यूहस्य जघने तस्थू रक्षमाणाः परस्परम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
व्यूहस्यैव पुनर्द्वारं गत्वा द्रोणो व्यवस्थितः |
३३ क