chevron_left  व्याक्रोशेतांarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
व्याक्रोशेतां महानादं दध्मतुश्चाम्वुजोत्तमौ ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
व्याक्षिपन्नाय़ुधानन्ये ममृदुश्चापरे भुजान् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
व्याक्षिपन्वलवच्चापमतिमात्रममर्षणः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
व्याक्षिपन्सहसा तत्र घोररूपे महामृधे ||
६० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
व्याख्यातं पूर्वकल्पेन मशकोदुम्वरं यथा |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
व्याख्यातं पूर्वकल्पेन यथा रथिपदातिनौ ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
यक्ष उवाच
व्याख्यातः पुरुषो राजन्यश्च सर्वधनी नरः |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
युधिष्ठिर उवाच
व्याख्याता क्षत्रधर्मेण वृत्तिरापत्सु भारत |
१ क
वन पर्व
अध्याय २९७
यक्ष उवाच
व्याख्याता मे त्वय़ा प्रश्ना याथातथ्यं परन्तप |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
व्याख्यातुं कुशलाः केचिद्ग्रन्थं धारय़ितुं परे ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
जनमेजय़ उवाच
व्याख्यातुमेतदिच्छामि सर्वमध्वर्युसत्तम ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
व्याख्यातो ह्यानुपूर्व्येण उपवासफलात्मकः ||
१३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
युधिष्ठिर उवाच
व्याख्यानमेषामाचक्ष्व पृच्छतो मे पितामह ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
व्याख्यास्याम्युग्रकर्माणं कुरूणामभय़ङ्करम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
व्याघुष्टतलनादेन वषट्कारेण पार्थिव |
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
व्याघूर्णमानाश्च सुवर्णमाला; व्याय़च्छतां तत्र तदा विरेजुः ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्रं त्वं मन्यसेऽऽत्मानं यावत्कृष्णौ न पश्यसि |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
व्याघ्रं दृष्ट्वा क्षुधाभग्नं दंष्ट्रिणं वनगोचरम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
व्याघ्रं शय़ानं प्रति मा प्रवोधय़; आशीविषं सृक्किणी लेलिहानम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
व्याघ्रः पशुमिवादाय़ मृत्युरादाय़ गच्छति ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
व्याघ्रः पशुमिवासाद्य मृत्युरादाय़ गच्छति ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्रकेतुं सुशर्माणं शङ्कुं चोग्रं धनञ्जय़म् |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
व्याघ्रगोमाय़ुसंवादं तं निवोध युधिष्ठिर ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
व्याघ्रचर्मपरीवारा वृताश्च द्वीपिचर्मभिः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
व्याघ्रचर्माम्वरधरः सिंहचर्मोत्तरच्छदः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
व्याघ्रचर्मोत्तरे श्लक्ष्णे सर्वतोभद्र आसने |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्रदत्तश्च पाञ्चाल्यः सिंहसेनश्च वीर्यवान् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्रदत्तश्च पाञ्चाल्यो द्रोणं विव्याध मार्गणैः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
व्याघ्रदत्तश्च राजेन्द्र चन्द्रसेनश्च भारत |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्रदत्तस्य चाक्रम्य भल्लाभ्यामहरद्वली ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
व्याघ्रपाद इति ख्यातो वेदवेदाङ्गपारगः |
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
व्याघ्रश्चित्रैस्तथा योनिं पुरुषः स्वां निय़च्छति ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्रसिंहगजाकीर्णानतिक्रम्येव पर्वतान् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
व्याघ्रसिंहप्रय़ुक्तं च मेघस्वननिनादितम् |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
व्याघ्रसिंहर्क्षवदना विडालमकराननाः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
व्याघ्रस्तूटजमूलस्थस्तृप्तः सुप्तो हतैर्मृगैः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्रा इव जिघांसन्तस्त्वदीय़ाभ्यद्रवन्रणे ||
७ ग
विराट पर्व
अध्याय ६६
अर्जुन उवाच
व्याघ्रानृक्षान्वराहांश्च हतवान्स्त्रीपुरे तव ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
व्याघ्रान्सिंहान्वराहांश्च गजांश्च महिषांस्तथा ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्राविव च सङ्ग्रामे चेरतुस्तौ महारथौ |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्राविव नरव्याघ्रौ दंष्ट्राभिरितरेतरम् |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्राविव सुसंरव्धौ गर्जन्ताविव तोय़दौ |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
व्याघ्राविव सुसंरव्धौ श्येनाविव च शीघ्रगौ |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
व्याघ्रीव च हरेत्पुत्रमदष्ट्वा मा पतेदिति ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
व्याघ्रो नागो मदपटुर्नागः सिंहत्वमाप्तवान् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
व्याघ्रो भूत्वा जहीमं त्वं राजपुत्रमिति प्रभो ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
व्याघ्रो व्याघ्र इव स्थाप्यो द्वीपी द्वीपी यथा तथा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
व्याघ्रो हस्तिभय़ात्त्रस्तस्तमृषिं शरणं यय़ौ ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
व्याजहार ततो वाक्यं विदुरः सत्यसङ्गरः |
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
व्याजहार सतां मध्ये दिव्यदर्शी महातपाः ||
७ ख