अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
विस्तारो लवणः कूपः कुसुमः सफलोदय़ः |
१२४ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
विस्तीर्णं चैव नः सैन्यं हन्याच्छिद्रेषु वै परः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
विस्तीर्णं ददृशतुरम्वरप्रकाशं; तेऽगाधं निधिमुरुमम्भसामनन्तम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
विस्तीर्णकूलह्रदशोभितासु; तपस्विसिद्धद्विजसेवितासु |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
विस्तीर्णा योजनशतं शतमध्यर्धमाय़ता |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
विस्तीर्णा सप्ततिश्चैव योजनानि सितप्रभा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
विस्तीर्णैषा कथा राजञ्श्रुता मे पितृसंनिधौ |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
विस्तीर्यैतन्महज्ज्ञानमृषिः सङ्क्षेपमव्रवीत् |
४९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
विस्पन्दमाना दुःखेन वीरा जहति जीवितम् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
विस्पर्धमाना व्यचरंस्तथा सिद्धर्षिचारणैः |
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
विस्पष्टं प्रोच्यते तत्र शिष्याणां हितकाम्यया ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
विस्पष्टलक्षणा वुद्धिः कच्चिच्चोपस्थिता तव ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
विस्फारस्तस्य धनुषो यन्त्रस्येव तदा वभौ |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
विस्फारितविकृष्टानां कार्मुकाणां च कूजताम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
विस्फारैर्धनुषो देवा द्यौरभेदीति मेनिरे ||
८२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
विस्फार्य गाण्डीवमथोग्रघोषं; ज्यया समाहत्य तले भृशं च |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
विस्फार्य च धनुःश्रेष्ठं ध्वजे भूतान्यचोदय़त् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
विस्फार्य च धनूंष्याजौ ज्याः करैः परिमृज्य च |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
विस्फार्य च महच्चापमिन्द्राशनिसमस्वनम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
विस्फार्य विव्यधे क्रुद्धो जलसन्धं शरेण ह ||
४२ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
विस्फार्य सशरं चापं तूर्णमश्वानचोदय़त् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
विस्फार्य सुमहच्चापं मुहुः कर्णमवैक्षत ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
विस्फार्य सुमहच्चापं हेमपृष्ठं दुरासदम् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
विस्फारय़न्तश्चापानि नानारूपाण्यनेकशः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
विस्फारय़न्तश्चापानि वलवन्ति दृढानि च ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
विस्फारय़न्तश्चापानि विसृजन्तश्च साय़कान् |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
विस्फारय़न्धनुः कर्णस्तस्थौ भारत दुर्मनाः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
विस्फारय़न्धनुर्घोरमिदं वचनमव्रवीत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
विस्फुरञ्शनकैर्भीमो न शशाक विचेष्टितुम् ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
विस्फुरद्भिश्च तैर्द्रौणिर्निस्त्रिंशस्योद्यमेन च |
४० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
विस्फुरन्तं च पशुवत्तथैवैनममारय़त् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
विस्फुरन्तं महावेगं विचकर्ष वलाद्वली ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
विस्फुरन्तः श्वसन्तश्च वेष्टय़न्तस्तथा परे |
२१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
विस्फुलिङ्गा इव ह्येतान्दहन्ति किल मानवान् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
विस्मापनं महाराज नरराक्षसय़ोर्मृधे ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
विस्मापनान्यचिन्त्यानि शस्त्रवन्त्युत्तमानि च ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
विस्मापय़न्प्रेक्षणीय़ं द्विषातां भय़वर्धनम् |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मितः स जनः सर्वो ददर्शानिमिषेक्षणः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
विस्मितः सह कृष्णेन क्षिप्तो वाण इवात्यगात् ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
विस्मितश्चाद्भुतं दृष्ट्वा काश्यपस्तं द्विजोत्तमम् |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
पितर ऊचुः
विस्मितश्चापि राजर्षिरिमां गाथां जगाद ह |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मितस्तामनिन्द्याङ्गीं दृष्ट्वासीद्धृष्टमानसः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मिता चानवद्याङ्गी दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मिता चाव्रवीत्कन्या व्रीडिता च मनस्विनी ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मिता मानुषाश्चासन्दृष्ट्वा तां यज्ञसम्पदम् ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मिता वचनं प्राहुरिदं सर्वे महार्थवत् ||
२६ ग
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मिताः पुरुषव्याघ्रा वभूवुः पृथय़ा सह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मिताः समपद्यन्त पुराणस्य निवेदनात् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
विस्मिताः समपद्यन्त साधु साध्विति चाव्रुवन् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
गाव ऊचुः
विस्मिताः स्म महाभागे तव रूपस्य सम्पदा ||
४ ख