भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्वोजश्च सुदक्षिणः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्वोजश्च सुदक्षिणः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ कुन्तिभोजं महारथम् |
६९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ केकय़ा वाह्लिकैः सह |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ केतुमन्तमनुव्रतौ ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ क्षेमधूर्तिश्च वीर्यवान् |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ चित्रसेनश्च संय़ुगे ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दुर्मुखं चापि कौरवम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ द्रोणो द्रौणिः ससौवलः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः |
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पतितौ पश्य माधव |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ परिवार्योपतस्थिवान् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पार्षतं पत्युपस्थितौ ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ राजपुत्रौ महावलौ |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ वामं पार्श्वमपालय़न् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ वाह्लिकः सह वाह्लिकैः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ वाह्लिकश्च सवाह्लिकः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ विराटं दशभिः शरैः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ विराटं मत्स्यमार्च्छताम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ विराटं मत्स्यमार्छताम् |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ समेतौ रथसत्तमौ |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्धवश्च जय़द्रथः ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्येन महता वृतौ |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दौ कैकेय़ौ सात्यकिः समवारय़त् ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दौ च तथा त्रिभिस्त्रिभिरताडय़त् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुवाहुर्दुष्प्रधर्षणः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दौ सहितौ सुवर्माणं च ते सुतम् |
९८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दौ सुमुखो दीर्घवाहुः सुदर्शनः ||
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
विन्दानुविन्दय़ोः साय़ं शिविरे यो महाध्वनिः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
विन्दुन्यासादय़ोऽवस्थाः शुक्रशोणितसम्भवाः |
११६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
विन्देतानन्तरं भार्यामनुरूपां यथाविधि ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
विन्ध्यश्च पारिय़ात्रश्च सप्तैते कुलपर्वताः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
विन्ध्ये सन्ताप्य चात्मानं सत्यसन्धस्त्वहिंसकः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
विन्ध्यो धातुविचित्राङ्गस्तीर्थवानौषधान्वितः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
विनय़ं कृतविद्यानां विनाशं पापकर्मणाम् ||
६१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
विनय़न्तं जवेनाश्वान्महाराजस्य पश्यतः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
विनय़श्च विसर्गश्च कालाकालौ च भारत ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
विनय़ाचारहीनाश्च अशिवाश्च नराधमाः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
विनय़ात्सहदेवस्य सदृशो नकुलस्य च ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
विनय़ान्निय़मांश्चापि सदा सर्वात्मना श्रिता ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
पशुसख उवाच
विनय़ार्थं सुविद्वांसमुपासेय़ं यथातथम् ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
विनय़ावनतो राजन्नुपसर्प्य महामुनिम् |
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
विनय़ेनाञ्जलिं कृत्वा प्रय़त्नेनोपगम्य च |
१२१ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
विनय़ेनानताः सर्वे प्रणिपेतुश्च भारत ||
३० ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
विनय़ेनोपसङ्गम्य प्रणय़ाद्वाक्यमव्रवीत् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
विनय़ैरपि दुर्वृत्तान्प्रहारैरपि पार्थिवः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
विनय़ो जय़ः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वतां पतिः ||
६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
विपक्षः स्रस्तकाय़श्च विचेता विह्वलः खगः |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
विपणापणवान्रम्यो भक्ष्यभोज्यविहारवान् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
विपण्यापणपण्यानां नानाजनशतैर्वृतः |
२८ ख