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कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानाः शरैरन्ये तदा भीताः प्रदुद्रुवुः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानाः शितैर्वाणैः पाण्डवैः सहसृञ्जय़ैः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानानि सैन्यानि समन्तात्तैर्महारथैः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानापि कर्णेन नाजहू रणमूर्धनि ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानाश्च समरे पुत्रास्तव विशां पते |
१०१ ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
वध्यमानास्ततस्ते तु निवातकवचाः पुनः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
वध्यमानास्ततस्ते तु हय़ैस्तेन रथेन च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
वध्यमानास्ततो लोकाः सागरैर्मन्दवुद्धिभिः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानास्तथास्त्रेण तेन नाराय़णेन वै |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
वध्यमाने ततः सैन्ये द्रौपदेय़ा महारथाः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
वध्यमाने ततः सैन्ये विपुला भीः समाविशत् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
धृतराष्ट्र उवाच
वध्यमाने वले चापि मामके पाण्डुसृञ्जय़ैः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
वध्यमाने वले चैव भीमसेनेन संय़ुगे ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
वध्यमाने वले तस्मिंस्तव पुत्रस्य मारिष |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
वध्यमाने वले तस्मिन्सूतपुत्रेण मारिष |
५ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
वध्यमाने शरीरे तु देहनाशो भवत्युत |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानेषु चास्त्रेषु पीडितः सूतनन्दनः |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानेषु ते राजंस्तदा पुत्रेषु धन्विषु ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
वध्यमानेषु तेष्वाजौ गान्धारेषु समन्ततः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानेषु योधेषु तावकेष्वितरेषु च ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
वध्यमानेषु योधेषु धनञ्जय़मुपाद्रवत् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानेषु सङ्ग्रामे पाञ्चालेषु महात्मना |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानेषु सैन्येषु द्रोणपार्षतसाय़कैः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
वध्यमानेषु सैन्येषु वचनं चेदमव्रवीत् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानेष्वनीकेषु मद्रराजेन पाण्डवः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
वध्यमानो महाराज सूतपुत्रेण पाण्डवः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
वध्यस्त्वं न त्वय़ार्थोऽस्ति मुहूर्तमपि जीवता ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
लुव्धक उवाच
वध्यस्त्वं मम दुर्वुद्धे वालघाती नृशंसकृत् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
वध्यानामिव सर्वेषां मनो भवति विह्वलम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
वध्यान्विषह्यान्सङ्ग्रामे न हनिष्यामि ते सुतान् |
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
भगवानु उवाच
वध्यास्ते सर्वतः पापा ये युष्मास्वपराधिनः |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
वध्यास्ते सर्वलोकस्य किं पुनस्तव भारत ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
वध्यो भवेय़ं विप्रेन्द्राः शक्रस्य सह दैवतैः |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
वध्राः करीषकाश्चापि कुलिन्दोपत्यकास्तथा |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
वध्वः पुत्रा भागिनेय़ा भगिन्यो; दौहित्रा वा कच्चिदप्यव्यलीकाः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
वध्वा हासं श्वशुरो यश्च मन्यते; वध्वा वसन्नुत यो मानकामः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १६७
गन्धर्व उवाच
वध्वादृश्यन्त्यानुगत आश्रमाभिमुखो व्रजन् |
११ क
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
वनं कण्टकितं घोरमेक एवान्वपद्यत ||
१२ ग
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
वनं कुरूणां छेत्स्यामि भल्लैः संनतपर्वभिः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
वनं कुसुमितं द्रष्टुं परं कौतूहलं हि मे ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
वनं गच्छ मय़ा सार्धं धृतराष्ट्रेण चैव ह ||
२३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
वनं गच्छेत्पुरुषो धर्मकामः; श्रेय़श्चित्वा स्थापय़ित्वा स्ववंशम् ||
३० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
वनं गते कौरवेन्द्रे दुःखशोकसमाहताः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
वनं गतेषु पार्थेषु निर्जितेषु दुरोदरे |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
वनं गन्तुं च विदुरो राज्ञा सह कृतक्षणः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
वनं गुरुमिवासाद्य वस्तव्यं वनजीविभिः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
वनं च तदभूत्तेन हीनमक्लिष्टकर्मणा |
६ क
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
वनं च दोषवहुलं वहुव्यालसरीसृपम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
वनं चूतानां रत्नविभूषितानां; न चैव तेषामागतोऽहं फलेन ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
वनं जगाम कौरव्यो भार्याभ्यां सहितोऽनघ ||
५ ख