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शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
रुषद्गुः कवषो धौम्यः परिव्याधश्च वीर्यवान् |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
रुषद्गुर्वृषसेनश्च क्षुपश्च सुमहावलः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
रुषिताः पन्नगा यद्वद्गिरिमुग्रा महावलाः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
रुषितोऽभ्येति वेगेन द्रोणकर्णौ महावलौ ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
रूक्षवर्णाश्च जलदा दृश्यन्तेऽद्भुतदर्शनाः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
रूक्षा वाचो विमोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ||
८१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
रूक्षाश्च वाताः प्रववुर्नीचैः शर्करवर्षिणः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
व्यास उवाच
रूक्षय़ा व्राह्मणो राजन्पुनः पुनरथाव्रवीत् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
रूढकक्षवनप्रस्था प्रसन्नजलनिम्नगा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
रूपं गन्धं रसं स्पर्शं शव्दं चैतांस्तु तद्गुणान् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
रूपं गन्धो रसः स्पर्शः शव्दश्चैवाथ तद्गुणाः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १८४
तार्क्ष्य उवाच
रूपं च ते दिव्यमत्यन्तकान्तं; प्रज्ञां च देवीं सुभगे विभर्षि ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
रूपं चक्षुः प्रकाशश्च दर्शने हेतवस्त्रय़ः |
१०१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
मन उवाच
रूपं चक्षुर्न गृह्णाति त्वक्स्पर्शं नाववुध्यते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
रूपं चक्षुर्विपाकश्च त्रिधा ज्योतिर्विधीय़ते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
रूपं चक्षुस्तथा पक्तिस्त्रिविधं तेज उच्यते |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
रूपं चाप्रतिरूपं तत्त्रिदशेष्वपि दुर्लभम् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
रूपं ज्योतिः शव्द आकाशवाय़ुः; स्पर्शः स्वाद्यं सलिलं गन्ध उर्वी |
६८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
भीम उवाच
रूपं द्रक्ष्यन्ति पुरुषा रामस्येव महात्मनः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
रूपं न चक्षुषा विद्याज्जिह्वय़ा न रसांस्तथा ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
रूपं न सदृशं तस्यास्तर्कय़ामास किञ्चन ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
करालजनक उवाच
रूपं निर्वर्तय़त्येतदेवं सर्वासु योनिषु ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
रूपं पितुरपश्यं तच्छकुनेः पततो यथा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
जनमेजय़ उवाच
रूपं प्रभावमहतामपूर्वं धीमतां वर ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण उवाच
रूपं भवति वै व्यक्तं तदनुद्रवते मनः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
रूपं महत्ते वहुवक्त्रनेत्रं; महावाहो वहुवाहूरुपादम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
रूपं विभीषणं कृत्वा रोषेण प्रज्वलन्निव ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
रूपं सन्ध्याभ्रसंय़ुक्तं किमुपस्थाप्यतां तव ||
७५ ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
रूपं सुदर्शनस्यासीदाकाशे पततस्तदा |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
रूपकूलां मनःस्रोतां स्पर्शद्वीपां रसावहाम् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
रूपतो दृश्यते कश्चिन्नागेषु भविता ध्रुवम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
रूपतो वर्णतश्चैव नामतश्च निवोध मे ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
रूपतो वीर्यतश्चैव याथातथ्येन पाण्डवः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
रूपद्रविणहीनांश्च सत्त्वहीनांश्च नाक्षिपेत् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
रूपमत्राधिभूतं तु सूर्यस्तत्राधिदैवतम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
रूपमप्रतिमं कृत्वा लोभनीय़ं जनाधिप |
२ क
वन पर्व
अध्याय १४८
वैशम्पाय़न उवाच
रूपमप्रतिमं वीर तदिच्छामि निरीक्षितुम् ||
३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
रूपमव्यङ्गतामाय़ुर्वुद्धिं सत्त्वं वलं स्मृतिम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
रूपमाधुर्यगन्धैस्तां संय़ुक्तां देवरूपिणीम् |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
रूपमानवय़ोमानश्रीमानाश्चाप्यसंशय़म् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
रूपमासीद्विय़त्स्थानां सर्पाणां सर्पतामिव ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
रूपमासीन्महाराज द्विषतां शोकवर्धनम् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
रूपमैश्वर्यमारोग्यमहिंसाफलमश्नुते |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
रूपरागात्तथा चक्षुर्घ्राणं गन्धचिकीर्षय़ा ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
रूपलक्षणसम्पन्नां शीलाचारसमन्विताम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
रूपवत्यश्च तं कन्या रमय़न्ति सदा नरम् |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय २०८
नार्यु उवाच
रूपवन्तमधीय़ानमेकमेकान्तचारिणम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
रूपवन्तमरूपत्वादुदय़ास्तमय़े वुधाः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
रूपवन्तो गुणोपेतास्तथालुव्धा जितश्रमाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
रूपवर्णस्वरोपेतस्तितिक्षुरनसूय़कः |
२१ क