आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
राजानो राजपुत्राश्च समाजग्मुः सहस्रशः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
राजानो राजपुत्राश्च सर्वतो निहता नृप ||
२७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
राजानो लोकय़ात्रार्थं तप्यन्ते परमं तपः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
युधिष्ठिर उवाच
राजानो वा यदि वा राजपुत्रा; वलेन मत्ता वञ्चनां प्राप्नुवन्ति ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
राजानो व्राह्मणा वैश्याः शूद्राश्चैव युधिष्ठिर |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
राजानो हतशिष्टास्त्वां राजन्नभित आसते |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
राजानो हि स्वधर्मेण श्रिय़मिच्छन्ति भूय़सीम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
राजापि च स्मय़न्भीमो मनसाभिविचिन्तय़त् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२७८
मार्कण्डेय़ उवाच
राजापि दुहितुः सर्वं वैवाहिकमकारय़त् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
राजापि शिविरं प्राय़ात्प्रणिपत्य महात्मने |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
राजाप्येतेन विधिना भगवन्तं पितामहम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
राजाभिपन्नस्य कुतः सुखानि; राजाभ्युपेतं सुखिनं करोति ||
५८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
राजार्हाणि च सर्वाणि भक्ष्यभोज्यान्यनेकशः |
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
द्रोण उवाच
राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे ||
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
राजासीद्यः प्रजापालः प्रजानामप्रिय़ो भवेत् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
यय़ातिरु उवाच
राजाहं राजपुत्रश्च यय़ातिरिति विश्रुतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
राजाहं व्राह्मणश्च त्वं यदि षट्कर्मसंस्थितः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
राजाहमासमिह सार्वभौम; स्ततो लोकान्महतो अजय़ं वै |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
देवय़ान्यु उवाच
राजाय़ं नाहुषस्तात दुर्गे मे पाणिमग्रहीत् |
२९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
राजाय़ं वृद्धतां प्राप्तः प्रमाणे परमे स्थितः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
राजीवनेत्रो राजानं हेतुमद्वाक्यमुत्तमम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
राजीवलोचनं कर्णं सात्यकिः प्रत्यविध्यत ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
राजीवलोचनं क्रुद्धं राजा वचनमव्रवीत् ||
८३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
राजेन्द्र पर्युपासीथाश्छित्त्वा द्वैविध्यमात्मनः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
राजैव कर्ता भूतानां राजैव च विनाशकः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
राजोपक्रोशदोषाश्च सर्वे संश्रय़वासिनाम् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
राजोपरिचरेत्येवं नाम तस्याथ विश्रुतम् ||
३१ ग
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
राजोपरिचरो नाम धर्मनित्यो महीपतिः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
राजोपरिचरो नाम वभूवाधिपतिर्भुवः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
राज्ञ एवापराधं तं मन्यन्ते किल्विषं नृप ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
राज्ञ एवापराधं तं मन्यन्ते तद्विदो जनाः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञः कन्या विराटस्य नर्तय़ानं महाभुजम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञः कुणिन्दाधिपतेः परिदाय़ महारथाः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
राज्ञः कोशक्षय़ादेव जाय़ते वलसङ्क्षय़ः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
राज्ञः कोशवलं मूलं कोशमूलं पुनर्वलम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
राज्ञः पन्था व्राह्मणेनासमेत्य; समेत्य तु व्राह्मणस्यैव पन्थाः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
राज्ञः परैः परिभवः सर्वेषामसुखावहः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
राज्ञः प्रज्ञानय़ुक्तोऽपि न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञः प्रमाददोषेण दस्युभिः परिमुष्यताम् |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञः प्रीत्या धृतराष्ट्रस्य ते वै; पुनः पुनः समहृष्टास्तदानीम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
माद्र्यु उवाच
राज्ञः शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
राज्ञः शोकापहो जात एष द्रोणवधाय़ वै |
४० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
राज्ञः सकाशे तेषां च प्रतिज्ञातो वधो मय़ा ||
४५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
राज्ञः सकाशे न विभेति चापि; ततो भय़ं जाय़ते क्षत्रिय़स्य ||
१६ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञः सङ्क्रमणे चापि कालोऽय़ं वर्तते ध्रुवम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
युधिष्ठिर उवाच
राज्ञः सङ्क्षीणकोशस्य वलहीनस्य भारत ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
राज्ञः समाज्ञापय़त सेनां योजय़तेति ह |
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
राज्ञः समीपं व्रह्मर्षिः काश्यपो गन्तुमैच्छत ||
१४ ख