chevron_left  रमसेऽस्मिन्महारण्येarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ७८
वृहदश्व उवाच
रमसेऽस्मिन्महारण्ये धर्ममेवानुचिन्तय़न् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
रमस्व योषाभिरुपेत्य कामं; कामो हि राजंस्तरसाभिपाती ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
रमस्वैधस्व मोदस्व देहि चैव यजस्व च |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
रमे चाहं त्वय़ा पुत्र पुरेव गजसाह्वय़े |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
रमे चाहं त्वय़ा सार्धमरण्येष्वपि पाण्डव |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
स्त्र्यु उवाच
रमे चैवाधिकं स्त्रीत्वे सत्यं वै देवसत्तम |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
रमे जपन्महाभाग कृतं लोकैः सनातनैः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
रम्भा नामाप्सराः शापाद्यस्य शैलत्वमागता ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भृगुरु उवाच
रम्यं नानाश्रय़ाकीर्णं यस्यान्तो नाधिगम्यते ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
रम्यं पद्मसरो गत्वा कालकूटमतीत्य च ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
रम्यं विन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
रम्यं विन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः |
४१ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
रम्यतीर्था वहुजला पय़ोष्णी द्विजसेविता ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
रम्यमावसथं चैव दत्त्वामुं लोकमास्थितः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
रम्या पाषाणतीर्था च पुरश्चन्द्रा च भारत ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
रम्यां ते कीर्तय़िष्यामि युधिष्ठिर यथास्मृति ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
रम्यां विशालामाश्रित्य तप उग्रं समास्थितौ ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
रम्याद्भागीरथीकच्छाद्यथाकामं प्रतस्थिरे ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यो वनावृताः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
रमय़न्ति नरश्रेष्ठ गोप्रदानरतं नरम् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
रमय़न्ति मनः कान्ता विमाने सूर्यसंनिभे |
११४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
रमय़न्ति स्म तान्विप्रान्यज्ञकर्मान्तरेष्वथ ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
रमय़न्ति स्म नृपते देवराजं शतक्रतुम् ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
रमय़न्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
रमय़न्तो महात्मानं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
वैशम्पाय़न उवाच
रमय़न्वृष्णिशार्दूलं पाण्डवांश्च महामुनिः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
रमय़ामास शैलस्थं वालं क्रीडनकैरिव ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय २
अर्जुन उवाच
रमय़िष्ये महीपालमन्यांश्चान्तःपुरे जनान् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४५
सूत उवाच
ररक्ष पृथिवीं देवीं श्रीमानतुलविक्रमः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ररक्ष भगवाञ्शौरिः शार्ङ्गचक्रगदाधरः ||
३४ ग
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
ररक्ष वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिपः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
ररक्ष सा चाप्यति तं सुमन्त्रं; जातोऽप्येवं न स शुश्राव विप्रः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
ररक्ष सा मम रथं हय़ांश्चोपस्कराणि च |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १०६
वैशम्पाय़न उवाच
रराज कुन्त्या माद्र्या च पाण्डुः सह वने वसन् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
रराज जय़तां श्रेष्ठो द्रोणपुत्रस्तवाहितान् ||
९९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
रराज तच्चाश्रममण्डलं सदा; दिवीव राजन्रविमण्डलं यथा ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
रराज पार्थः परमेण तेजसा; वृत्रं निहत्येव सहस्रलोचनः ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
रराज भगवांस्तत्र देव्या सह महेश्वरः |
९ क
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
रराज भैमी समवाप्तकामा; शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
रराज राजन्पुत्रस्ते काञ्चनः शैलराडिव ||
५५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
रराज राजन्पुत्रस्ते काञ्चनः शैलराडिव ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
रराज राजन्महनीय़कर्मा; यथैकपर्वा रुचिरैकशृङ्गः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
रराज राजेन्द्र सुवर्णवर्मा; मध्यं गतः सूर्य इवांशुमाली ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
रराज राजोत्तम राजमुख्यै; र्वृतः स देवैरिव वज्रपाणिः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
रराज वसुधा कीर्णा विसर्पद्भिरिवोरगैः ||
११७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३६
सञ्जय़ उवाच
रराज वसुधा कीर्णा विसर्पद्भिरिवोरगैः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
रराज स महाराज विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
रराज सङ्ख्ये परिवर्तमानो; विद्युन्माली मेघ इवान्तरिक्षे ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
रराज समरे राजन्रश्मिवानिव भास्करः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
रराज समरे राजन्सपत्र इव किंशुकः ||
२५ ख