chevron_left  यदासीच्चाक्षुषंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
यदासीच्चाक्षुषं जन्म द्वितीय़ं व्रह्मणो नृप |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
यदासीन्मानसं जन्म नाराय़णमुखोद्गतम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भरद्वाज उवाच
यदासृजत्सहस्राणि भूतानां स महामतिः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१
देवस्थान उवाच
यदासौ सर्वभूतानां न क्रुध्यति न दुष्यति |
५ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
यदास्थितो रथं दिव्यं पदा न चलितो भवान् ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५६
विदुर उवाच
यदास्थितोऽय़ं धृतराष्ट्रस्य पुत्रो; दुर्योधनः सृजते वैरमुग्रम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
यदास्य उद्धरन्त्यन्ये तदा राजानमिच्छति ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
यदास्य तद्धरन्त्यन्ये तदा राजानमिच्छति |
८ क
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
यदास्य तुल्यः पुरुषो न कश्चित्तत्र विद्यते |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
यदास्य वदतो वाक्यं न स चक्रे द्विजोत्तमः |
३२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यदाह च महेष्वासः कृपो विदुर एव च ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
यदाह भगवान्व्यासस्तत्कुरुष्व नृपोत्तम ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यदाह भगवान्व्यासो यच्चापि भवतो मतम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
यदाह भरतश्रेष्ठो भीष्मस्तत्क्रिय़तां नृप |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
यदाह मां भवान्व्रह्मन्सम्वन्धिवचनाद्वचः |
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८६
दुर्योधन उवाच
यदाह विदुरः कृष्णे सर्वं तत्सत्यमुच्यते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४९
प्रजापतिरु उवाच
यदाहं नाधिगच्छामि वुद्ध्या वहु विचारय़न् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
वलिरु उवाच
यदाहमिव भावी त्वं तदा नैवं वदिष्यसि ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
यदाहमेतज्जानामि न मृत्युस्तिष्ठतीति ह |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
यदाहारोऽभवद्राजा धृतराष्ट्रो महामनाः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
यदाय़मतिकष्टानि सर्वाण्युपनिषेवते |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
यदाय़ाज्जलदप्रख्यो रथः परमवीर्यवान् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
यदाय़ान्नकुलो धीमान्के शूराः पर्यवारय़न् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
यदि आवां महाप्राज्ञ त्यक्ष्यसि त्वं विशां पते |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
शल्य उवाच
यदि कर्ण रणे हन्यादद्य त्वां श्वेतवाहनः |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
यदि कर्ता भवेत्कर्ता न क्रिय़ेत कदाचन |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
यदि काङ्क्षन्ति ते राज्यं पितृपैतामहं पुनः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
यदि कार्ष्णिर्धनुष्पाणिरिह स्यान्मकरध्वजः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
यदि कालः प्रमाणं ते कस्माद्धर्मोऽस्ति कर्तृषु ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
यदि कालः प्रमाणं ते न वैरं कस्यचिद्भवेत् |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
सर्प उवाच
यदि काले तु दोषोऽस्ति यदि तत्रापि नेष्यते |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
यदि कालेन निर्याणं सुखदुःखे भवाभवौ ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
यदि कालेन पच्यन्ते भेषजैः किं प्रय़ोजनम् ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
यदि किञ्चन कर्तव्यमय़मस्मि प्रशाधि माम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
यदि किञ्चिच्छ्रुतं तेऽस्ति सर्वं कृतमनर्थकम् ||
६४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
यदि कुन्तीसुतं गेहे क्रीडन्तं भ्रातृभिः सह |
७ क
सभा पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
यदि कुर्याम यज्ञार्थं किं ततः परमं भवेत् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
यदि कृत्यं न पश्यामि तवाद्येह यथा पुरा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
यदि कैश्चिदहोरात्रैर्न द्रक्ष्यामि नलं नृपम् |
८४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
यदि कौतूहलं तेऽद्य पाण्डवानां वले नृप |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५३
नारद उवाच
यदि कौतूहलं तेऽस्ति व्रज माधव मा चिरम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ४६
सूत उवाच
यदि गच्छेदसौ पापो ननु जीवेत्पिता मम ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
यदि गुह्यं तपोनित्या न वो व्रूतेह माचिरम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
राजो उवाच
यदि गुह्यं न ते विप्र लोकेऽस्मिन्किं नु दुर्लभम् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
यदि गृध्रस्य वाक्यानि तीव्राणि रभसानि च |
१०१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
यदि च मनुजपन्नगाः पिशाचा; रजनिचराः पतगाः सुरासुराश्च |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
यदि चापि प्रिय़ं किञ्चिन्मय़ि कर्तुमिहेच्छसि |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
यदि चापि समर्थः स्यास्त्वं दानाय़ सुय़ोधन |
५२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
यदि चाप्यागमाः सन्ति यदि वा श्रुतय़स्तथा |
३० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
यदि चाभ्यनुजानीषे सैन्धवापसदस्य च ||
५ ग