अनुशासन पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
यदा प्रमाणप्रभवः स्वभावश्च सुखासुखे |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
यदा प्रवसते भर्ता कुटुम्वार्थेन केनचित् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
यदा प्रवुद्धः कौन्तेय़स्तदा सञ्छिद्य वन्धनम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
यदा प्रवुद्धास्त्वव्यक्तमवस्थाजन्मभीरवः |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
यदा प्रसन्नो भगवान्महादेवो भविष्यति |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
यदा प्रार्थय़ते किञ्चित्तदा भवति सा मनः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
यदा प्रय़त्नं कृतवान्दृश्यते ह्यफलो नरः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
युधिष्ठिर उवाच
यदा भक्तो भगवत आसीद्राजा महावसुः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
यदा भवति निर्द्वन्द्वो मुनिर्मौनं समास्थितः |
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
यदा भविष्यन्ति नरास्तदा सङ्क्षेप्स्यते युगम् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा भीमो भीमरूपो निहन्ता; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
यदा भूय़ः श्रवणजा सृष्टिरासीन्महात्मनः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
यदा मनसि सा वुद्धिर्वर्ततेऽन्तरचारिणी |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा मन्दः परवाणान्विमुक्ता; न्ममेषुभिर्ह्रिय़माणान्प्रतीपम् |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय
५६
विदुर उवाच
यदा मन्युं पाण्डवोऽजातशत्रु; र्न संय़च्छेदक्षमय़ाभिभूतः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
यदा मां चैव भार्यां च द्रष्टासि भृशदुर्वले |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
यदा मृतश्च स्वजनं न ज्ञास्यसि कथञ्चन |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
वलिरु उवाच
यदा मे भविता कालस्तदा त्वं तानि द्रक्ष्यसि ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
यदा मोहमनुप्राप्तः सस्वेदश्च जनार्दनः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा मौर्व्यास्तलनिष्पेषमुग्रं; महाशव्दं वज्रनिष्पेषतुल्यम् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
यदा यदा च धर्मस्य ग्लानिर्भवति सत्तम |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यदा युक्ता नय़न्त्यर्थान्कामादर्थवशेन वा |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
यदा रजस्वलां कृष्णां दुःशासनवशे स्थिताम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा रथं हेममणिप्रकाशं; श्वेताश्वय़ुक्तं वानरकेतुमुग्रम् |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा रथाग्र्यो रथिनः प्रचेता; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा रथे गाण्डिवं वासुदेवं; दिव्यं शङ्खं पाञ्चजन्यं हय़ांश्च |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
यदा राजा धुरं श्रेष्ठामादाय़ वहति प्रजाः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यदा राजा शास्ति नरान्नशिष्या; न्न तद्राज्यं वर्धते भूमिपाल ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
यदा राजा समर्थोऽपि कोशार्थी स्यान्महामते |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
यदा राज्यमिदं कुन्ति भोक्तव्यं पुत्रनिर्जितम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यदा राष्ट्रे धर्ममग्र्यं चरन्ति; संस्कारं वा राजगुणं व्रुवाणाः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
यदा रुद्ररथं क्रुद्धो महिषः सहसा गतः |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
यदा रौद्रा धर्महीना मांसादाः पानपास्तथा |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
यदा वकपती राजन्व्रह्माणं नोपसर्पति |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यदा वर्षसहस्राय़ुस्तदा भवति मानवः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
यदा वहुविधां वृद्धिं मन्यते प्रतिलोमतः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२५१
वैशम्पाय़न उवाच
यदा वाचं व्याहरन्त्यामस्यां मे रमते मनः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
यदा वाचा न तिष्ठन्ति धार्तराष्ट्राः सराजकाः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
यदा वाचोगतं सर्वं तव वाचि समाहितम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सात्यकिरु उवाच
यदा वालः सुभद्राय़ाः सुतः शस्त्रविनाकृतः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
यदा विकुरुते भावं तदा भवति सा मनः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
यदा विनिय़तं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा विपाठा मद्भुजविप्रमुक्ता; द्विजाः फलानीव महीरुहाग्रात् |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा विराटः परवीरघाती; मर्मान्तरे शत्रुचमूं प्रवेष्टा |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
यदा विवुद्धः कौन्तेय़स्तदा सञ्छिद्य वन्धनम् |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
यदा विहारं प्रसमीक्षमाणाः; प्रय़ान्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि |
३० क