शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
योऽहमज्ञानसंमोहादज्ञय़ा सम्प्रवृत्तवान् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
योऽहमत्राभवं सक्तः पराङ्मुखमुपस्थितः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
योऽहमद्य नरव्याघ्रान्सुप्तान्पश्यामि भूतले ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
योऽहमेवं कृतो मातस्त्वय़ा लोभपरीतय़ा |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
योऽय़ं काञ्चनसंनाहः पार्ष्णिं वहति शोभनः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
योऽय़ं तपःप्रभावेन ऋषिसन्तोषणेन च |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
योऽय़ं धुरं धुर्यवरो वामं वहति शोभनः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
योऽय़ं परेषां पृतनां समृद्धां; निराय़ुधो दीर्घभुजो निहन्यात् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
योऽय़ं पृथिव्याः कार्त्स्न्येन विनाशः समुपस्थितः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
योऽय़ं प्रश्नस्त्वय़ा पृष्टो गोप्रदानाधिकारवान् |
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
योऽय़ं मूर्धावसिक्तानामग्रे याति परन्तपः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
अर्जुन उवाच
योऽय़ं योगस्त्वय़ा प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
योऽय़ं राज्ञो विराटस्य कीचको नाम भारत |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
योऽय़ं लोभान्मन्यते धर्ममेतं; यमिच्छते मन्युवशानुगामी ||
२८ ग
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
योऽय़ं वहति ते पार्ष्णिं दक्षिणामञ्चितोद्यतः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
योऽय़ं वृष्णिकुले जातो राजानं हतवान्पुरा ||
१५ ग
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
योऽय़मक्षतधर्मात्मा भ्राता वचनकारकः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
योऽय़मद्य महावाहुर्धर्मं समनुपश्यति ||
४१ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
योऽय़मस्मासु सर्वेषु शुश्रूषुरनहङ्कृतः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
योऽय़मासाद्य तं दावं तर्पय़ामास पावकम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
योऽय़मेकोऽभिमनुते सर्वाँल्लोके धनुर्भृतः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१२४
च्यवन उवाच
यौ चक्रतुर्मां मघवन्वृन्दारकमिवाजरम् ||
१० ख
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
यौ तावर्जुन शिष्यौ ते प्रिय़ौ वहुमतौ सदा |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
यौ तु माद्री महेष्वासावसूत कुरुसत्तमौ |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
युधिष्ठिर उवाच
यौ तु स्यातां चरणेनोपपन्नौ; यौ विद्यया सदृशौ जन्मना च |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
यौ तौ कर्णश्च भीमश्च सम्प्रय़ुद्धौ महावलौ |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
यौ तौ कुमाराविव कार्त्तिकेय़ौ; द्वावश्विनेय़ाविति मे प्रतर्कः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
यौ तौ मय़ा ते कथितौ पूर्वमेव महावलौ |
२६ क
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
यौ तौ वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथौ मतौ |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
यौ तौ समीय़तुर्वीरावर्जुनस्य रथं प्रति |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
यौ नित्यमनुजीवामः क्षमिणौ पुरुषर्षभौ ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
यौ मां विप्रकृतां क्षुद्रैर्मर्षय़ेतां जनार्दन ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
यौ सदा विभ्रतुर्वीरौ ताविमौ केशवार्जुनौ ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
यौ समेय़ास्थितौ धर्मे श्रद्धेय़ौ सुतपस्विनौ ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०८
नार्यु उवाच
यौगपद्येन तं विप्रमभ्यगच्छाम भारत ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
यौगपद्येन पार्थैर्हि विजितेय़ं वसुन्धरा ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
यौगपद्येन विप्रश्च स पुरीद्वारमाविशत् |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
यौधिष्ठिरस्तु सङ्क्रुद्धः सौवलं निशितैः शरैः |
६१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
यौधिष्ठिरस्य सैन्यस्य श्रुत्वा शव्दं महारथाः |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
यौधिष्ठिरो ध्वजं तस्य छित्त्वा भूमावपातय़त् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
यौधेय़ारट्टराजन्यमद्रकाणां गणान्युधि |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
यौधेय़ारट्टराजन्यान्मद्रकांश्च गणान्युधि |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
यौधेय़ाश्च ललित्थाश्च क्षुद्रकाश्चाप्युशीनराः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
यौनकाम्वोजगान्धाराः किराता वर्वरैः सह ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
यौनात्सम्वन्धकाल्लोके विशिष्टं सङ्गतं सताम् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
यौनैर्हार्दैश्च सम्वन्धैः सम्वद्धाः स्मेह पाण्डवैः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
यौवनं प्रतिपेदे च पूरुः स्वं पुनरात्मनः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
यौवनं भवते दत्त्वा चरिष्यामि यथात्थ माम् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
यौवनं समनुप्राप्ता सा च कन्या शिखण्डिनी ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
यौवनस्थां तु तां दृष्ट्वा स्वां सुतां देवरूपिणीम् |
३१ क