उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वाहुवले तुल्यः पृथिव्यां नास्ति कश्चन |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
यस्य वाहुवले तुल्यः प्रभावे च पुरन्दरः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वाहू समाश्रित्य वय़ं सर्वे महात्मनः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वाहू समाश्रित्य वय़ं सर्वे महात्मनः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
युधिष्ठिर उवाच
यस्य वाहू समाश्रित्य सुखं सर्वे स्वपामहे |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
यस्य वाहू समौ दीर्घौ ज्याघातकठिनत्वचौ |
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य वाह्वोर्वलं तुल्यं कुञ्जराणां शतं शतम् ||
१०८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
युधिष्ठिर उवाच
यस्य विज्ञानमतुलं विष्णोर्भक्तिश्च तादृशी ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य विद्युत्प्रभां शक्तिं दिव्यां कनकभूषणाम् |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
यस्य विप्रानुशासन्ति साधोर्भूमिं सदैव हि |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
यस्य वीजं फलं तस्य शुक्रं चेत्कारणं मतम् ||
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वीरस्य यो वेषो यो ध्वजो यच्च वाहनम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
युधिष्ठिर उवाच
यस्य वीरस्य वीर्येण मुक्ता जतुगृहाद्वय़म् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वीर्यं समाश्रित्य द्यूतं पुत्रस्तवाकरोत् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
यस्य वीर्यं समाश्रित्य धार्तराष्ट्र विकत्थसे |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
युधिष्ठिर उवाच
यस्य वीर्यं समाश्रित्य वसुपूर्णां वसुन्धराम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
यस्य वीर्यं समाश्रित्य शमं याचन्तमच्युतम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य वीर्यवतो वीर्यं समाश्रित्य महात्मनः |
७८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
यस्य वीर्यवतो वीर्यमुपजीवन्ति पाण्डवाः ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
यस्य वीर्ये समाश्वस्य धार्तराष्ट्रो वृहन्मनाः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य वीर्ये समाश्वस्य मम पुत्रो वृहद्वलः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वीर्येण सदृशाश्चत्वारो भुवि मानवाः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
यस्य वुद्धिं परिभवेत्तमतीतेन सान्त्वय़ेत् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
यस्य वृत्तं न जल्पन्ति मानवा महदद्भुतम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वृत्तं नमस्यन्ति स्वर्गस्थस्यापि मानवाः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
यस्य वेदिरुपस्तीर्णा तस्य लोका यथा मम ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
यस्य वै तादृशी भार्या धन्यः स मनुजो भुवि ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य वै नानृता वाचः प्रवृत्ता अनुशुश्रुमः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
यस्य वै युधि सन्त्रासात्कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
यस्य वै शैशिरे काले तडागे सलिलं भवेत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य व्रह्मर्षय़ः पुण्या नित्यमासन्सभासदः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
यस्य व्रह्मा च विष्णुश्च त्वं चापि सह दैवतैः |
१०२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
यस्य व्राह्मणसात्सर्वमात्मार्थं न महात्मनः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य शस्त्रप्रतापेन प्रणताः सर्वपार्थिवाः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
यस्य शाखामृगा मित्रा ऋक्षाः कालमुखास्तथा |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य शासनमाज्ञाय़ चराम विगतज्वराः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य शुक्रात्सत्यवती प्रादुर्भूता यशस्विनी ||
७१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
मातो उवाच
यस्य शूरस्य विक्रान्तैरेधन्ते वान्धवाः सुखम् |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
यस्य शूरा महेष्वासाः प्रत्यनीकगता रणे |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
यस्य शोणितवेगेन नदी स्यात्समभिप्लुता |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
यस्य श्लाघन्ति विवुधाः कर्माण्यूर्जितकर्मणः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
यस्य संस्तववक्ता त्वं वन्दिवत्सततोत्थितः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
भीम उवाच
यस्य सङ्ग्राममध्येषु दिव्यमस्त्रं विकुर्वतः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
यस्य सत्त्ववतो वीर्यमुपजीवन्ति पाण्डवाः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य सर्पमुखो दिव्यः शरः कनकभूषणः |
६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य सर्वे वर्धय़न्ति स्म मानं; करूषराजप्रमुखा नरेन्द्राः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्वन्धनास्त्विह |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
यस्य सर्वे समारम्भाः निराशीर्वन्धनाः सदा |
४३ क