द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्नभ्यधिका वीरे गुणाः सर्वे धनञ्जय़ात् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
यस्मिन्नर्थे हितं यत्स्यात्तद्वर्णं रूपमाविशेत् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्मिन्नस्त्रं च मेधा च नीतिश्च भरतर्षभे |
५४ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
यस्मिन्नस्त्राणि दिव्यानि समस्तानि महात्मनि |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्नस्त्राणि सत्यं च व्रह्मचर्यं च नित्यदा ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्नहनि भीमस्तु जज्ञे भरतसत्तम |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
यस्मिन्नाश्वसते कश्चिद्यश्च नाश्वसते क्वचित् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्नित्ये तते तन्तौ दृढे स्रगिव तिष्ठति |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३७
भीष्म उवाच
यस्मिन्नेतानि दृश्यन्ते न चाकार्याणि भारत |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि वहिरेव स वै द्विजः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि स मां पृच्छतु पाण्डवः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
यस्मिन्नेवं कुले सर्वं कल्याणं तत्र वर्तते ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
यस्मिन्नेवंविधं दुःखं प्राप्नुय़ात्सत्यविक्रमः ||
२५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्नोजश्च तेजश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
यस्मिन्पारिप्लवे दिव्या वहन्त्यापो विहाय़सा |
४६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्रह्मो उवाच
यस्मिन्प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति; स वै श्रेष्ठो गच्छत यत्र कामः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
यस्मिन्प्रतिष्ठिताः सम्यक्क्षेमं विन्दन्ति तत्क्षणम् |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्रह्मो उवाच
यस्मिन्प्रलीने प्रलय़ं व्रजन्ति; सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्प्रशासति सतां नृपतौ नृपसत्तम |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
यस्मिन्महास्त्राणि समर्पितानि; चित्राणि शुभ्राणि चतुर्विधानि |
९० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
यस्मिन्मित्रे पितरीवाश्वसीत; तद्वै मित्रं सङ्गतानीतराणि ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
यस्मिन्यज्ञे हि भूर्दत्ता कश्यपाय़ महात्मने |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्यत्नः कृतोऽस्माभिः स नो हीनः प्रय़त्नतः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
यस्मिन्यथा वर्तते यो मनुष्य; स्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
यस्मिन्यथा वर्तते यो मनुष्य; स्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
यस्मिन्यथावत्सखि वर्तमाना; भर्तारमाच्छेत्स्यसि कामिनीभ्यः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
यस्मिन्यस्मिंस्तु विनय़े यो यो याति विनिश्चय़म् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४०
भीष्म उवाच
यस्मिन्यस्मिंस्तु विषय़े यो यो याति विनिश्चय़म् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्राजर्षभे जाते धर्मात्मनि महात्मनि |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
यस्मिन्राजा सत्यधृतिर्युधिष्ठिरः; समास्थितो भीमसेनार्जुनौ च |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
यस्मिन्वाचः प्रविशन्ति कूपे प्राप्ताः शिला इव |
८ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्विनष्टे पाञ्चालाः सह पुत्रैस्तथा वय़म् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
यस्मिन्विलीय़ते धर्मस्तं देवा वृषलं विदुः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्विश्वानि भूतानि तिष्ठन्ति च विशन्ति च |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
यस्मिन्वृतो मुहूर्तेऽहं त्वय़ेह नृपते वरम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्व्रह्मसदश्चैव तिष्ठते च प्रजापतिः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
यस्मिन्सत्यं धृतिर्दानं तपः शौचं दमः शमः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्सत्यं धृतिर्दानं परा शान्तिर्ध्रुवा क्षमा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वतश्च यः |
५४ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
युधिष्ठिर उवाच
यस्मिन्सर्वं सम्भवति यश्च सर्वत्र पूज्यते |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्सहस्रं पद्मानां कण्वाय़ भरतो ददौ ||
४८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
धृतराष्ट्र उवाच
यस्मिन्साक्षाद्धनुर्वेदो ह्रीनिषेधे प्रतिष्ठितः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
यस्मिन्हि सर्वमाय़त्तं स दण्ड इह केवलः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
यस्मै कामान्वर्षति वासुदेवो; ग्रीष्मात्यये मेघ इव प्रजाभ्यः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मै क्षेप्स्यसि रुष्टः सन्सोऽनय़ा न भविष्यति ||
२० ग
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
यस्मै देवाः प्रय़च्छन्ति पुरुषाय़ पराभवम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
यस्मै देवाः प्रय़च्छन्ति पुरुषाय़ पराभवम् |
७८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
यस्मै प्रज्ञां कथय़न्ते मनुष्याः; प्रज्ञामूलो हीन्द्रिय़ाणां प्रसादः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मै वह्निर्वरान्प्रादात्ततो वव्रे वरान्गय़ः |
१०५ क