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वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वां धर्मपरं श्रेष्ठं रूक्षाण्यश्रावय़त्तदा ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
यस्त्वां ध्रुवं वेदय़ते गुहाशय़ं; प्रभुं पुराणं पुरुषं विश्वरूपम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वां राजन्मय़ा सार्धमजिनैः प्रतिवासितम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
यस्त्वां वेत्ति स मां वेत्ति यस्त्वामनु स मामनु |
६४ क
सभा पर्व
अध्याय १६
युधिष्ठिर उवाच
यस्त्वां स्पृष्ट्वाग्निसदृशं न दग्धः शलभो यथा ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वादृशानां च गरीय़सां च; हन्ता रिपूणां तुमुले प्रगाढे ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
यस्त्वादृशो विकुर्वीत यशस्वी लोकविश्रुतः |
३३ ख
वन पर्व
अध्याय २५२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वाद्य पातालमुखे पतन्तं; पाणौ गृहीत्वा प्रतिसंहरेत ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
यस्त्वामेको विषहितुं शक्नुय़ात्कमलालय़े ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वासीद्देवको नाम देवराजसमद्युतिः |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
यस्त्विन्द्रिय़ाणि मनसा निय़म्यारभतेऽर्जुन |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वेकां रजनीं तीर्थे वत्स्यते सुसमाहितः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
यस्त्वेको वहुभिः श्रेय़ान्कामं तेन गणं त्यजेत् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
यस्त्वेतां निय़तश्चर्यां व्रह्मर्षिविहितां चरेत् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
यस्त्वेतानि प्रमाणानि यथोक्तान्यनुपश्यति |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
यस्त्वेतान्नाचरेद्विद्वांस्तपस्तस्याभिवर्धते ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
यस्त्वेतान्प्रज्ञय़ा दोषान्पूर्वमेवानुपश्यति |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
यस्त्वेतेनैव विधिना गां वनेष्वनुगच्छति |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
यस्त्वेतेभ्यः प्रवसेद्द्वादशेभ्यः; सर्वामपीमां पृथिवीं प्रशिष्यात् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
यस्त्वेतैः शारीरैर्मानसैर्दुःखैर्न स्पृश्यते स सुखं वेद |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
यस्त्वेव तु विजानीते यो भुङ्क्ते यश्च भुज्यते ||
९ ग
वन पर्व
अध्याय १९०
वामदेव उवाच
यस्त्वेवं व्रह्म तपसान्वेति विद्वां; स्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ||
६६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वेष पार्श्वेऽस्य महाधनुष्मा; ञ्श्यामो युवा वारणय़ूथपाभः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
वृहन्नडो उवाच
यस्त्वय़ं विमलः खड्गो गव्ये कोशे समर्पितः |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वय़ं सर्वमुत्सृज्य धानामुष्टिपरिग्रहः |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ३८
वृहन्नडो उवाच
यस्त्वय़ं साय़को दीर्घः शिलीपृष्ठः शिलीमुखः |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वय़ा समय़ो विप्र कृतो मे तपतां वर |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
यस्त्वय़ा स्पर्धते नित्यं सर्वत्र पुरुषर्षभ |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
यस्त्वय़ा स्वय़मेवार्थः प्रतिज्ञातो मम द्विज |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
यस्माच्चाय़मभिहतोऽनपकारी तस्माददृष्टं त्वां भय़मागमिष्यतीति ||
८ घ
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
यस्माच्चैतन्मय़ा प्राप्तं ज्ञानं वैशेषिकं पुरा |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वासुदेव उवाच
यस्माच्छक्तेन ते कृष्ण न त्राताः कुरुपाण्डवाः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
यस्माज्जानन्सुमन्दात्मा मामसौ नोपसर्पति |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
यस्मात्कुक्षौ वर्तमानो व्रवीषि; तस्माद्वक्रो भवितास्यष्टकृत्वः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
यस्मात्तण्डिः पुरा प्राह तेन तण्डिकृतोऽभवत् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय २५
कश्यप उवाच
यस्मात्तस्मात्सुप्रतीक हस्तित्वं समवाप्स्यसि ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
यस्मात्तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मिन्विजितस्त्वय़ा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मात्तस्माद्व्रतं ह्येतत्त्रिसौपर्णमिहोच्यते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
यस्मात्तु क्रिय़ते कर्ता तस्मात्कर्ताप्यनीश्वरः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
यस्मात्तु लोके दृश्यन्ते क्षमिणः पृथिवीसमाः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
यस्मात्तु वहु रूक्षं च श्रावितस्ते वृकोदरः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
यस्मात्त्रस्यन्ति भूतानि मृगव्याधान्मृगा इव |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मात्त्वं मामनादृत्य नेमां वाचं चिकीर्षसि |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
यस्मात्त्वमप्यदुष्टमन्नं दूषय़सि तस्मादनपत्यो भविष्यसीति ||
१२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
यस्मात्त्वमीदृशे काले सर्वभूतेप्सिते सति |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
यस्मात्त्वय़ा मद्वचोऽनुष्ठितं तस्माच्छ्रेय़ोऽवाप्स्यसीति |
३० ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
यस्मात्त्वय़ा महावाहो फलं तस्मादवाप्नुहि ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मात्त्वय़ा राजानो विप्रलव्धास्तस्मादव्रह्मण्यानि तवापत्यानि भविष्यन्त्यनृतकत्वात्तवेति ||
४० क