वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
मृगद्विजाश्च वहवो रुचिरा मधुरस्वराः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
मृगधूमं ततो गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |
८५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
मृगनिर्मोकवसनाश्चीरवल्कलवाससः |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
मृगपक्षिगणाश्चैव वहुशः पृतनां तव |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
मृगपक्षिमनुष्याश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीय़ेषु सर्वदा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
मृगपक्षिसधर्माणः क्षिप्रमासञ्जडोपमाः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
मृगमध्यं प्रविश्येव यथा सिंहशिशुं वने ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
मृगमध्ये यथा सिंहो दृश्यते निर्भय़श्चरन् |
५८ क
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
मृगमध्ये यथा सिंहो मुहुः परिघमैक्षत ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
मृगमहिषवराहसृमरगजाकीर्णेषु तपस्यन्तोऽनुसञ्चरन्ति |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
मृगमालोक्य हिंसाय़ां स्वर्गवासं समर्थय़त् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
मृगराजं हितैर्वाक्यैः सम्वोधय़ितुमागमत् ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
मृगराजेन चाज्ञप्तं मृग्यतां चोर इत्युत ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
मृगराडिव सङ्क्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
मृगरूपधरं हत्वा मामेवं काममोहितम् ||
२७ ग
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
मृगरूपधरेणाथ रक्षसा सोऽपकर्षणम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
यय़ातिरु उवाच
मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीय़ार्थमुपागतः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
मृगवधकलहे ऋतेऽर्जुना; त्सुरपतिवीर्यसमप्रभावतः ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
धर्म उवाच
मृगवेषेण कौन्तेय़ जिज्ञासार्थं तव प्रभो ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
मृगव्यवाय़निधने कृच्छ्रां प्राप स आपदम् |
६८ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
मृगव्याधश्च शर्वश्च निरृतिश्च महाय़शाः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
मृगव्याधश्च शर्वश्च निरृतिश्च महाय़शाः |
५७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
मृगव्याधाय़ महते धन्विनेऽथ भवाय़ च ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
मृगव्याधोऽभवत्कश्चिद्वलाको नाम भारत |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
मृगश्च भूत्वा मारीचस्तं देशमुपजग्मतुः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
मृगसङ्घानिवारण्ये विभीर्भीमवलो हरिः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
मृगसङ्घान्यथा क्रुद्धः सिंहो द्रावय़ते वने |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
मृगसङ्घैर्वृतं घोरैरन्यैश्चापि वनेचरैः ||
१३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
मृगस्तु चतुरो मासांस्ततश्छागः प्रजाय़ते ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
मृगस्तु विद्धो वाणेन मय़ा सरति शल्यवान् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२९५
वैशम्पाय़न उवाच
मृगस्य घर्षमाणस्य विषाणे समसज्जत ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
मृगस्वरा द्वीपिनेत्रा ऋषभाक्षास्तथापरे |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
मृगा वहुविधाकाराः सम्पतन्ति दिशो दश |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
मृगाः शकुन्ताश्च वदन्ति घोरं; हस्त्यश्वमुख्येषु निशामुखेषु |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
मृगाः शृगालाः शितिकण्ठाश्च काका; गृध्रा वडाश्चैव तरक्षवश्च ||
९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
मृगाः सिंहा वराहाश्च स्थलान्याश्रित्य तस्थिरे ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेय़श्च पक्षिणाम् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
मृगाणामथ सिंहानां व्याघ्राणां च विशां पते |
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
मृगाणामधमं श्वानं प्रवदन्ति मनीषिणः |
५३ क
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
मृगाणामिव शार्दूलो गरुडः पततामिव |
२० क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
मृगाणामुपय़ोगश्च वीरुदोषधिसङ्क्षय़ः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
मृगान्दृष्ट्वा सुदुःखार्तो धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२५१
द्रौपद्यु उवाच
मृगान्पञ्चाशतं चैव प्रातराशं ददानि ते ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
मृगान्विध्यन्वराहांश्च चचार रिपुमर्दनः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
मृगान्विध्यन्वराहांश्च तरक्षून्महिषांस्तथा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
मृगान्विध्यन्वराहांश्च रम्येषु मरुधन्वसु ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
मृगान्व्याघ्र इवाजिघ्रंस्तव सैन्यमभीषय़त् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
मृगापकृष्टेन हि ते मृगय़ां परिधावता |
६६ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
मृगाभिशापान्नष्टं मे प्रजनं ह्यकृतात्मनः |
२६ क