वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
यक्ष उवाच
मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
मा तुषाग्निरिवानर्चिः काकरङ्खा जिजीविषुः |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
मा ते ग्लानिर्महावाहो मा च तेऽस्तु पराभवः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
मा ते धर्मस्तथैवार्थो नश्येत भरतर्षभ ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
मा ते भूद्भीः पूर्वदृष्टो धर्मोऽय़ं व्रह्मणा स्वय़म् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
मा ते मन्युर्महावाहो भवत्वत्र द्विजान्प्रति ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
मा ते राष्ट्रे याचनका मा ते भूय़ुश्च दस्यवः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो; दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
मा ते व्यथास्तु निहतान्वन्धून्वीक्ष्य पुनः पुनः |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
मा तेऽन्यत्पुरुषव्याघ्र दानाद्भवतु दर्शनम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
मा त्याक्षीः समय़ं राजन्सत्यं सङ्गतमस्तु ते ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
मा त्वं राजन्व्याहर व्याहरत्सु; न तिष्ठसे क्रोशमात्रे रणार्धे |
७३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
मा त्वं व्रह्मगतिं हिंस्याः प्राय़श्चित्तं कृतं त्वय़ा |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
मा त्वं शुचस्तां प्रति भीरु विद्धि; यथाद्य कृष्णा पुनरेष्यतीति |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
मा त्वमेवङ्गते किञ्चित्क्षत्रिय़र्षभ शोचिथाः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
मा त्वा दहेय़ुः सङ्क्रुद्धा वालखिल्या मरीचिपाः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
मा त्वा दुर्वलचक्षूंषि धक्ष्यन्त्यग्निरिवाश्रय़म् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
मा त्वा पश्येत्सुकृपणं शत्रुः श्रीमान्कदाचन ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वामदेव उवाच
मा त्वा वधीद्वरुणो घोरपाशै; र्व्रह्मक्षत्रस्यान्तरे वर्तमानः ||
६० ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
मा त्वा वृक्षेण कर्माणि कुर्वाणमतिमानुषम् |
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
उत्तर उवाच
मा त्वा व्रह्मविषं घोरं समूलमपि निर्दहेत् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
मा त्वा हत्वा प्रदास्यामि क्रव्याद्भ्यो मद्रकाधम ||
१०१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
मा त्वां दुर्वलचक्षूंषि प्रदहेय़ुः सवान्धवम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
संवर्त उवाच
मा त्वां धक्ष्ये चक्षुषा दारुणेन; सङ्क्रुद्धोऽहं पावक तन्निवोध ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
मा त्वेवानार्यजुष्टेन कर्मणा निधनं गमः ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७५
शर्मिष्ठो उवाच
मा त्वेवापगमच्छुक्रो देवय़ानी च मत्कृते ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
मातो उवाच
मा दीदरस्त्वं सुहृदो मा त्वां दीर्णं प्रहासिषुः ||
५ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
मा दौहित्रवधं श्रुत्वा वसुदेवो महात्ययम् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
मा द्यूतमित्यभाषन्त शमोऽस्त्विति च सर्वशः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
मा द्रक्ष्यसि कुलस्यास्य घोरं सङ्क्षय़मात्मनः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
मा द्रुहः पाण्डवान्राजन्कुरुष्व हितमात्मनः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
मा द्रोणमिति पुत्रास्ते कुरून्सर्वानचोदय़न् ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
मा धर्मं जहि सुश्रोणि क्रोधं जहि महामते ||
४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
मा धूमाय़ ज्वलात्यन्तमाक्रम्य जहि शात्रवान् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
मा नः कुले वैरकृत्कश्चिदस्तु; राजामात्यो मा परस्वापहारी |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
मा निमज्जस्व सगणः शल्यमासाद्य गोष्पदम् ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
मा नोऽवमंस्था विद्म मनस्तवेदं; शिक्षस्व वुद्धिं स्थविराणां सकाशात् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
मा परस्वमभिद्रोग्धा मा धर्मान्सकलान्नशीः ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
मा परेषां मुखप्रेक्षाः स्थेत्येवं तत्कृतं मय़ा ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
मा पाण्डवैः सार्धमिति तच्च मोहान्न वुध्यसे ||
३० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
मा पापमात्मनः पुत्र शङ्केथास्त्वण्वपि प्रभो ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
स्थाणुरु उवाच
मा प्रजाः स्थावरं वैच जङ्गमं च विनीनशः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
मा भवन्तोऽनुतप्यन्तां सौहृदान्निधनेन मे |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
मा भाङ्क्षीर्धर्मलोभेन धर्ममुत्सृष्टवानसि ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
मा भीम साहसं कार्षीस्तिष्ठत्वेष वनस्पतिः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
मा भूद्रङ्गप्रकोपोऽय़ं भीमदुर्योधनोद्भवः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
मा भूद्विशङ्का तव कौरवेन्द्र; दृष्ट्वात्मनः क्लेशमिमं सुखार्ह ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६८
वसिष्ठ उवाच
मा भैः पुत्रि न भेतव्यं रक्षसस्ते कथञ्चन |
१ क