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विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
महिषी पाण्डुपुत्राणां दुहिता द्रुपदस्य च |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
महिषी पाण्डुपुत्राणां पञ्चेन्द्रसमवर्चसाम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
महिषीय़ुवराजाभ्यां श्रोतव्यं वहुशस्तथा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
महिषैर्भेदय़ामास धनुषाक्षो महीधरान् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
महिषैश्च वराहैश्च शार्दूलैश्च निषेवितम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
महिषैश्च वराहैश्च सृमरैश्चमरैरपि |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
महिषोऽपि रथं दृष्ट्वा रौद्रं रुद्रस्य नानदत् |
६१ क
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
महिषौ पुरुषश्चैको यस्तदादाय़ गच्छति ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
महिष्या सह राजेन्द्र सत्कारेण सुवर्चसम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
मही चाप्यभवद्दुर्गा कवन्धशतसङ्कुला ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
मही पङ्कधरं घोरमाकाशं श्रवणं तथा ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
भीष्म उवाच
मही महीजाः पवनोऽन्तरिक्षं; जलौकसश्चैव जलं दिवं च |
६ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
मही म्लेच्छसमाकीर्णा भविष्यति ततोऽचिरात् |
७० क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
मही विय़द्द्यौः सलिलानि वाय़ुना; यथा विभिन्नानि विभान्ति भारत |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
महीं गताः पार्थवलाभिभूता; विचित्ररूपा युगपद्विनेशुः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
महीं चक्रुश्चितां सर्वां शशशोणितसंनिभाम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
महीं चचार दारार्थी न च दारानविन्दत ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
महीं जगाम मोहार्तस्ततो राजन्धनञ्जय़ः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १६४
गन्धर्व उवाच
महीं जिगीषता राज्ञा व्रह्म कार्यं पुरःसरम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
महीं राजंस्ततश्चाहमगच्छं रुधिराविलः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३४
कुन्त्यु उवाच
महीं विजय़ते क्षिप्रं श्रुत्वा शत्रूंश्च मर्दति ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
महीं विजय़ते सर्वां शत्रूंश्चापि पराजय़ेत् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
च्यवन उवाच
महीं सपर्वतवनां यः करिष्यति भस्मसात् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
महीं स्फीतां ददद्राजा सर्वकामगुणान्विताम् |
५८ क
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
महीतलस्थं निहतं गृध्रास्तं पर्युपासते ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
महीतलस्था मुनय़ः शरीरैर्गतजीवितैः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
भीष्म उवाच
महीतलाद्गतः स्थानं व्रह्मणः समनन्तरम् |
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
महीतले पतिष्यामि सत्येनाय़ुधमालभे ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
महीधर इवात्युच्चः श्रीमानञ्जनपर्वतः ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
महीधर इवोदग्रस्त्रिशृङ्गो भरतर्षभ ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
महीधरं रैवतकं वासाय़ैवाभिजग्मतुः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
महीधरमिव श्वेतं गूढपादैर्विषोल्वणैः ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
धृतराष्ट्र उवाच
महीधरसमो धृत्या तेजसाग्निसमो युवा |
९ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
महीधरस्थः शीतेन सहसा प्रतिवोधितः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
महीधरस्येव महच्छिखरं वज्रदारितम् ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
महीधरा रत्नवन्तो रसा येषु प्रतिष्ठिताः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
महीधराभैः पतितैर्महागजैः; सकृत्प्रविद्धैः शरविद्धमर्मभिः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद्गन्धमुत्तमम् ||
४१ ख
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
महीपतिषु कौरव्य राजवत्पार्थिवार्हणम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
महीपालो महावीर्यैर्दक्षिणापथवासिभिः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
महीमनुचचारैका सुलभा नाम भिक्षुकी ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
महीमभ्यपतद्राजन्प्रभग्नं पुरमासुरम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
महीमवातरत्क्षिप्रं रथेनादित्यवर्चसा ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
महीमापूरय़ामास घोषेण त्रिदिवं तथा ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
महीरुहैराचितसानुकन्दरो; यथा महेन्द्रः शुभकर्णिकारवान् ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
महीविय़द्दिगीशानां सर्वनाशमिवाद्भुतम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
महीय़ते नरपतिर्ययातिः स्वर्गमास्थितः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
महेन्द्र इव पौलोम्या भार्यया स समेय़िवान् ||
३८ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्र इव लक्ष्मीवानास्ते परमपूजितः |
४६ क