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आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
मनोहराय़ाः शिशिरः प्राणोऽथ रमणस्तथा ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
मनोहरैः पुष्पितैश्च फलभारावनामितैः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
मनोहरैश्चित्रगृहैस्तथा जगतिपर्वतैः |
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
मनोहरो जितक्रोधो वीरवाहुर्विदारणः ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
मनोहृदय़नन्दिन्यो विमर्दे मधुराश्च याः |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
मनोहृदय़संह्लादी वाय़ुस्तमुपसेवते ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
मनोह्रदेति विख्याता सा हि तैर्मनसा हृता ||
२३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
मनोऽध्यात्ममिति प्राहुर्यथाश्रुतिनिदर्शनम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
अरुन्धत्यु उवाच
मनोऽनुरुन्धती भर्तुरिति मां विद्ध्यरुन्धतीम् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
मनोऽनुवर्तन्ति परावराणि; जलौकसः स्रोत इवानुकूलम् ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
मनोऽन्तरिक्षं विद्याश्च वाय़ुस्तेजो जलं मही ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
मनोऽभिलषितं राज्ञस्तं क्रतुं द्रष्टुमर्हथ ||
१० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
मन्तव्यमथ वोद्धव्यं ताः सप्त समिधो मम ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
मन्तव्यमथ वोद्धव्यं सप्तैते कर्महेतवः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
मन्तव्यमधिभूतं तु चन्द्रमाश्चाधिदैवतम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
मन्ता मन्तव्यं प्राशिता प्राशितव्यं; घ्राता घ्रेय़ं स्पर्शिता स्पर्शनीय़म् ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
मन्ता वोद्धा च सप्तैते भवन्ति परमर्त्विजः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
मन्ता वोद्धा च सप्तैते विज्ञेय़ाः कर्तृहेतवः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
मन्ता शास्ता विधाता च व्राह्मणो देव उच्यते |
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
मन्त्रं जिज्ञासमानः सन्वीभत्सुः समय़ोजय़त् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
मन्त्रं न वहुधा कुर्यादेवं राज्ञः प्रिय़ो भवेत् ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
मन्त्रं मूलवलेनान्यो यः प्रिय़ः प्रिय़ एव सः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
मन्त्रं राजा मन्त्रय़ामास राज; न्यद्यद्युक्तं रक्षणे वै प्रजानाम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
मन्त्रगुप्तिः प्रधानेषु चारश्चामित्रकर्शन |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रग्रामं च मे प्रादादव्रवीच्चैव मामिदम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रग्रामं तदा राजन्नथर्वशिरसि श्रुतम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २९०
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रग्रामो वलं तस्य ज्ञास्ये नातिचिरादिव ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
मन्त्रग्राहा हि राज्यस्य मन्त्रिणो ये मनीषिणः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
मन्त्रचिन्त्यं सुखं काले पञ्चभिर्वर्धते मही ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रजप्यसमाय़ुक्तास्तास्तदा समवर्तय़न् ||
२० ग
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
मन्त्रज्ञैः सचिवैः सार्धं सुहृद्भिः कार्यसिद्धय़े ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रपूतं हुतश्चाग्निर्दत्तं देय़ममत्सरम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
मन्त्रपूताभिरर्चित्वा निश्चक्राम गृहात्ततः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १६८
गन्धर्व उवाच
मन्त्रपूतेन च पुनः स तमभ्युक्ष्य वारिणा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
मन्त्रपूतैः कुशैर्जघ्नुरृषय़ो व्रह्मवादिनः ||
१०० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
मन्त्रभेदभय़ाद्राजंस्तस्मादेतद्व्रवीमि ते ||
५९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रभेदे हि ये दोषा भवन्ति पृथिवीक्षिताम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रमूला नय़ाः सर्वे चाराश्च भरतर्षभ |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रवच्चोपजिघ्रत्तं मूर्ध्नि प्रेम्णा द्विजोत्तमः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
मन्त्रवत्परिविष्यन्ते तेष्वधर्मो गवानृतम् ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
मन्त्रवन्मन्त्रितं तस्य मृषावादस्तु पातकः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
मन्त्रवर्जं न दुष्यन्ति कुर्वाणाः पौष्टिकीः क्रिय़ाः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
मन्त्रवित्कालविच्छूरः स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
मन्त्रश्च वर्णितः कृत्स्नस्तथा भेदार्थ एव च |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
मन्त्रसंवरणं कुर्वन्नित्यमेव परन्तप ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
युधिष्ठिर उवाच
मन्त्रसंवरणं दुःखं वहूनामिति मे मतिः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
मन्त्रसंवरणेनास्मि कुन्त्या दुःखेन योजितः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
मन्त्रसंहननो राजा मन्त्राङ्गानीतरो जनः ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रसिद्धं चरुं कृत्वा पुरोधाः प्रय़यौ तदा ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
मन्त्रस्य निय़मं कुर्यास्त्वमत्र पुरुषोत्तम |
२० क