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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
वासुदेव उवाच
भित्त्वा शरीरं भूतानामहिंसां प्रतिपद्यते ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा शरीराणि गजाश्वय़ूनां; जग्मुर्महीं शोणितदिग्धवाजाः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
भित्त्वा सौभद्रं वीरमेकं प्रविष्टं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
भित्त्वा स्वस्था तत इदं पूजनी वाक्यमव्रवीत् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा ह्युरस्तपनीय़ं च वर्म; जघान षड्भिस्त्वपरैः पृषत्कैः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वानीकं महेष्वासः परेषां वहुशो युधि |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७६
भृगुरु उवाच
भित्त्वार्णवतलं वाय़ुः समुत्पतति घोषवान् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वेदं दुर्भिदं सैन्यं प्रय़ास्ये नरसत्तम ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
भिद्यमानः शितैर्वाणैः सर्वावरणभेदिभिः ||
४० ग
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भरद्वाज उवाच
भिद्यमाने शरीरे तु जीवो नैवोपलभ्यते ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
भिद्यमानेषु च स्वेषु लम्वमाने च वै त्वय़ि |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
भिनत्ति जीवस्थानानि तानि मर्माणि विद्धि च ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
भिनत्ति न च मर्यादां स राज्ञो धर्म उच्यते ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
भिनत्ति शिरसा शैलमहिं भोजय़ते च यः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
भिनत्त्येकेन वाणेन सुमुक्तेन पतत्रिणा |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
भिन्दंश्छिन्दन्रुजन्कृन्तन्दारय़न्पाटय़ंस्तथा |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
भिन्दतां परमर्माणि राजन्दुर्मन्त्रिते तव ||
७१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
भिन्द्यात्सुदुर्भिदं व्यूहं यतमानोऽपि संय़ुगे ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
युधिष्ठिर उवाच
भिन्ध्यनीकं युधा श्रेष्ठ द्वारं सञ्जनय़स्व नः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
भीम उवाच
भिन्ध्यनीकं युधां श्रेष्ठ सव्यसाचिन्निमान्कुरु ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
भिन्नं हि स्वजनेन त्वां प्रसहिष्यन्ति शत्रवः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
भिन्नकुम्भा विरुधिराश्छिन्नहस्ताश्च वारणाः |
१०३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
भिन्नकुम्भान्विरुधिरान्भिन्नगात्रांश्च वारणान् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
भिन्नगात्रवराश्चैव च्छिन्नवालाश्च मारिष |
१०३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
भिन्ननौका यथा राजन्द्वीपमासाद्य निर्वृताः |
७२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
भिन्नमर्मा शरव्रातैश्छिन्नहस्तः स वारणः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
भिन्नश्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्तते ||
८१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
भिन्नसन्धिरथ क्लेदमद्भिः स लभते नरः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
भिन्ना नौरिव ते पुत्रो निमग्नः शोकसागरे |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
भिन्ना विमनसः सर्वे गच्छन्त्यरिवशं भय़ात् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
भिन्ना हि सेना नृपते दुःसन्धेय़ा भवत्युत |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
भिन्ना हय़ाः कुञ्जराश्चावभग्नाः; सञ्चूर्णिताश्चैव रथाः शिलाभिः ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
भिन्नानां वै मनुजेन्द्र पराय़णं; न विद्यते किञ्चिदन्यद्विनाशात् ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय २५
कश्यप उवाच
भिन्नानामतुलो नाशः क्षिप्रमेव प्रवर्तते ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
भिन्नाश्च वहुधा घण्टाः पतद्भिश्चूर्णिता गजैः ||
४६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
भिन्ने हि भाजने तात दिशो गच्छति तद्गतम् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
भिन्नेषु तेषु व्यूहेषु क्षत्रिय़ा इतरेतरम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
भिन्नैर्मित्रैः परित्यक्तं दुर्वलं कुरुते वशे ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
भिन्नैश्च परुषैः पादैः सव्रणैः शोणितोक्षितैः |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
भिन्नय़ोधं वलं यच्च द्विधा युक्तं च यद्भवेत् ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
भिमसेनोऽभिमन्युश्च राक्षसश्च घटोत्कचः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
भिषजो भेषजं कर्तुं कस्मादिच्छन्ति रोगिणे |
५२ क
वन पर्व
अध्याय १२४
इन्द्र उवाच
भिषजौ देवपुत्राणां कर्मणा नैवमर्हतः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
भीत उत्सृज्य तान्सर्वान्युद्धाय़ समुपस्थितः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
भीतं दिशोऽकीर्यत भीमनुन्नं; महानिलेनाभ्रगणो यथैव ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
वृहस्पतिरु उवाच
भीतं प्रपन्नं प्रददाति यो वै; न तस्य हव्यं प्रतिगृह्णन्ति देवाः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
वृहस्पतिरु उवाच
भीतं प्रपन्नं प्रददाति शत्रवे; न सोऽन्तरं लभते त्राणमिच्छन् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
वृहस्पतिरु उवाच
भीतं प्रपन्नं प्रददाति शत्रवे; सेन्द्रा देवाः प्रहरन्त्यस्य वज्रम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
भीतं रक्षो विप्रदुद्राव राज; न्कृत्वात्मानं विन्ध्यपादप्रमाणम् ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
भीतः कुन्तीसुतो राजा राधेय़स्यातिविक्रमात् ||
२५ ख