कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
पुनः पुनरथो वीरैरभज्यत जय़ोद्धतैः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
पुनः पुनरथोक्ता सा गतसत्त्वेव भामिनी |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
पुनः पुनरभज्यन्त सिंहेनेवेतरे मृगाः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
पुनः पुनरभिक्रोशन्नभिय़ाहीति भार्गवः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
५१
सूत उवाच
पुनः पुनरुवाचेदमास्तीकं वदतां वरम् ||
२१ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
पुनः पुनर्न मृश्यामि विनाशममितौजसाम् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
धृतराष्ट्र उवाच
पुनः पुनर्न मृष्यामि हतं देवव्रतं रणे |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
पुनः पुनर्न मृष्यामि हतं सैन्यं स्म पाण्डवैः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पुनर्निरीक्षन्तः प्रजग्मुस्ते प्रदक्षिणम् |
४९ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पुनर्मनो दध्रे राजसूय़ाय़ भारत ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
कृश उवाच
पुनः पुनर्मृगं नष्टं पप्रच्छ पितरं तव ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
पुनः पुनर्याच्यमानो दिष्टमित्यव्रवीच्छिवः |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पुनर्वर्धय़ानं शोकं राज्ञो ममैव च |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
पुनः पुनर्विवर्धेत स्वल्पोऽप्यनिवारितः ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
पुनः पुनश्च कौन्तेय़ान्माद्रीपुत्रौ च सान्त्वय़न् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
पुनः पुनश्च मरणं जन्म चैव पुनः पुनः |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पुनश्च मातङ्गः पिवस्वेति तमव्रवीत् |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पुनश्च वार्ष्णेय़ं पर्यष्वजत फल्गुनः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
पुनः पुनस्तूवरक मूढ औदरिकेति च |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
पुनः पुनस्तूवरक मूढ औदरिकेति च |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
पुनः पूर्णाय़तोत्सृष्टैर्विव्यधाते परस्परम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
पुनः प्रकाशमभवत्तमसा ग्रस्यते पुनः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः प्रतस्थे संरम्भात्सकाशमकृतात्मनाम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
पुनः प्रत्याहृतं चैव न दैवाद्भुजसंश्रय़ात् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
हनूमानु उवाच
पुनः प्रत्याहृता भार्या नष्टा वेदश्रुतिर्यथा ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
पुनः प्रभावः पार्थस्य पुराणः केशवस्य च |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
पुनः प्रवर्ततां द्यूतमिति मे निश्चिता मतिः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः प्रविश्य नगरं दंशितः स नृपोत्तमः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
पुनः प्रवृत्तिधर्मार्थं तामेव विदधे तनुम् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
पुनः प्रशमय़न्वाक्यैः कविः पञ्चशिखोऽव्रवीत् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः प्रहरणान्येषां कीर्त्यमानानि मे शृणु |
१०२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
पुनः प्रहस्य राधेय़ः पुनर्याहीत्यचोदय़त् ||
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
पुनः प्राञ्जलय़ो भूत्वा प्रणम्य शिरसा गुरुम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः प्राप्तमिदं राज्यं पितृपैतामहं मय़ा |
३ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः शक्ष्यन्त्युपादातुमन्यैर्दत्तानि कानिचित् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
पुनः शरशतेनैनं त्वरमाणो धनञ्जय़ः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः शोषं गमिष्यामि निरासुर्निरवग्रहः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
पुनः श्रुतञ्जय़ं नाम सुरथस्यानुजं रणे ||
१२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
पुनः स पार्थं वृषसेन उग्रै; र्वाणैरविध्यद्भुजमूलमध्ये |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
पुनः स वाणैस्त्रिभिरग्निकल्पै; राकर्णपूर्णैर्निशितैः सुपुङ्खैः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
पुनः स वाणैस्त्रिभिरग्निकल्पै; राकर्णपूर्णैर्निशितैः सुपुङ्खैः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
गुरुरु उवाच
पुनः संशय़मापन्नाः पप्रच्छुर्द्विजसत्तमाः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
पुनः सङ्क्षिप्यते सर्वं जगत्प्राप्ते युगक्षय़े ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२५६
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः सञ्जीवमानस्य तस्योत्पतितुमिच्छतः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
पुनः सन्तर्कय़ामास रवेर्भ्रष्टामिव प्रभाम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
पुनः सप्त शतानन्यान्सहस्रं चानिवर्तिनाम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पुनः समासाद्य रथान्सुदंशिताः; शिनिप्रवीरं जुगुपुः परन्तपाः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
पुनः सामाभिसंय़ुक्तं सम्प्रदानमथाव्रुवम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः सुप्तानुपाधाक्षीद्वालकान्वारणावते |
७८ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः सृजति वर्षाणि भगवान्भावय़न्प्रजाः ||
३३ ख