chevron_left  पुत्रैर्भेदोarrow_drop_down
सभा पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रैर्भेदो यथा न स्याद्द्यूतहेतोस्तथा कुरु ||
५२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रैर्विहीनो राज्येन स्वप्नलव्धधनो यथा ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
पुत्रैर्वैरं नित्यमुद्विग्नवासो; यशःप्रणाशो द्विषतां च हर्षः ||
३८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रैश्च पुरुषव्याघ्राः कुरवोऽन्ये च मानवाः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
पुत्रैश्चैव महेष्वासैर्नानाशस्त्रधरैर्युधि ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रैश्वर्यं महदिदमपास्य च महाफलम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
पुत्रैस्तव दुराधर्षै रक्षितः सुमहावलैः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
पुत्रो गृत्समदस्यापि सुचेता अभवद्द्विजः ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमव्रवीत् ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
पुत्रो द्युतिमतस्त्वासीत्सुवीरो नाम पार्थिवः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ७१
शुक्र उवाच
पुत्रो भूत्वा भावय़ भावितो मा; मस्माद्देहादुपनिष्क्रम्य तात |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
पुत्रो भ्राता पिता चैव स्वस्रेय़ो मातुलस्तथा |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
पुत्रो भ्राता वय़स्यो वा यद्यप्यात्मसमो भवेत् ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
पुत्रो मम भृशं मूढः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रो मम महातेजा दय़ितो वभ्रुवाहनः ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रो ममानुरूपश्च शूरश्चेति कुलोद्वहः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
पुत्रो ममाय़ं भगवन्कुवलाश्व इति स्मृतः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रो ममेय़मिति मे भावना पुरुषोत्तम |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
पुत्रो मे त्वत्समो देव भवेदिति ततोऽव्रुवम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ८०
यय़ातिरु उवाच
पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत स राजा पृथिवीपतिः |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
पुत्रो लोभो निकृत्यास्तु कृतघ्नो नार्हति प्रजाम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
पुत्रो वा यदि वा भ्राता पिता वा यदि वा सुहृत् |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
प्रह्राद उवाच
पुत्रो वान्यो भवान्व्रह्मन्साक्ष्ये चैव भवेत्स्थितः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रो हि तव दुर्धर्षः सम्प्राप्तः परमां गतिम् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रो ह्ययं मम नृपास्तपोवलसमन्वितः ||
१३ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रोऽदितेर्महाभागो वरुणो वै सितप्रभः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
पुत्रोऽपि तव दुर्धर्षो द्रौपद्यास्तनय़ान्रणे |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
पुत्रोऽहमपि विप्रर्षेः साक्षाद्विश्रवसो मुनेः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
पुत्रौ चान्धकभोजस्य वृद्धो राजा च ते दश ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
पुत्रौ ते देवसङ्काशौ व्यरोचेतां महावलौ ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
पुत्रौ तय़ोर्नरश्रेष्ठौ कौन्तेय़ं प्रतिजग्मतुः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रौ दृष्ट्वा सुसन्तप्ता नान्वपद्यत किञ्चन ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
पुनः कर्णं त्रिभिर्वाणैर्वाह्वोरुरसि चार्पय़त् ||
६६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
पुनः कर्णस्त्रिसप्तत्या भीमसेनं रथेषुभिः |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
पुनः कुञ्जरशार्दूलौ पुनः स्वर्भानुभास्करौ ||
२६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
पुनः पञ्चशतान्मत्स्यान्षट्सहस्रांश्च सृञ्जय़ान् |
८५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
पुनः पञ्चाशता तूर्णमाजघान स्तनान्तरे ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
पुनः पञ्चाशतेषूणां शतेन च समार्पय़त् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
पुनः पताकां सूतं च छत्रं चापातय़द्रथात् ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेय़ं तपस्विनम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पप्रच्छ वार्ष्णेय़ं कथं मन्दोऽव्रवीदिदम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पप्रच्छ साम्राज्ये भविष्यां जगतो गतिम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
पुनः पार्थं शरवर्षेण विद्ध्वा; द्रौणिर्घोरं सिंहनादं ननाद ||
६१ ग
आदि पर्व
अध्याय १६१
गन्धर्व उवाच
पुनः पीनाय़तश्रोणी दर्शय़ामास तं नृपम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
पुनः पुनः क्षम्यमाणः सान्त्व्यमानश्च भारत |
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
पुनः पुनः प्रणदतां दिदृक्षन्तौ वृकोदरम् ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
पुनः पुनः प्रसाद्यैनांस्त एनमिदमव्रुवन् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पुनः प्रसीदेति वाक्यं चेदमुवाच ह |
३१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
पुनः पुनः प्रेक्षमाणाः स्वकानारुरुहू रथान् ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
पुनः पुनः समाश्वस्य प्राय़ुध्यत रणोत्कटः |
९७ ख