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सभा पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
पित्रा मात्रा च पुत्रस्य यद्वै कार्यं परं स्मृतम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
पित्रा विभजते पुत्रो यश्च स्याद्गुरुतल्पगः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
पित्रा विवदमानश्च यस्य चोपपतिर्गृहे |
८ क
वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
पित्रा विहीनौ शोकार्तौ मय़ा चैव कथं नु तौ ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
पित्रा सार्धं समासीनमृद्ध्या परमय़ा युतम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
पित्रा स्थापय़ितव्या हि वय़मुत्पथमास्थिताः |
४६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
पित्रा स्वय़मनुज्ञातं कृष्णद्वैपाय़नेन वै |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
पित्रा ह्युक्तः प्रसन्नेन नाकामस्त्वं मरिष्यसि ||
४६ ग
वन पर्व
अध्याय २८२
सत्यवानु उवाच
पित्राहमभ्यनुज्ञातः सावित्रीसहितो गतः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
शुक उवाच
पित्राहमुक्तो भद्रं ते मोक्षधर्मार्थकोविदः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ४९
जरत्कारुरु उवाच
पित्रे दत्ता विमोक्षार्थं कथं वा पुत्र मन्यसे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
पित्रोक्तः कुपितेनाथ जहीमां जननीमिति ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
पित्र्यं तेभ्यः प्रदाय़ांशं पाण्डवेभ्यो यथोचितम् |
५३ क
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
पित्र्यं राज्यं प्रय़च्छैषां ततः सुखमवाप्नुहि ||
८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
पित्र्यं राज्यं महाराज कुरवस्ते सजाङ्गलाः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
पित्र्यं वा भजते शीलं मातृजं वा तथोभय़म् |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
युधिष्ठिर उवाच
पित्र्यं वाप्यथ वा दैवं दीय़ते यत्पितामह |
४८ क
वन पर्व
अध्याय ८०
नारद उवाच
पित्र्यं व्रतं समास्थाय़ न्यवसन्मुनिवत्तदा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १
कृष्ण उवाच
पित्र्यं हि राज्यं विदितं नृपाणां; यथापकृष्टं धृतराष्ट्रपुत्रैः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
पित्र्यमंशं प्रनष्टं च पुनरप्युद्धरिष्यति |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
पित्र्यमंशं महावाहो निमग्नं पुनरुद्धर |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
मरुत्त उवाच
पित्र्यमस्मि तव क्षेत्रं वहु मन्ये च ते भृशम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १११
पाण्डुरु उवाच
पित्र्यादृणादनिर्मुक्तस्तेन तप्ये तपोधनाः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तय़ोः पुनः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
पित्र्येणाश्रुप्रपातेन नाचिकेतः कुरूद्वह |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
पित्र्योंऽशः शक्य आदातुमपि वज्रभृता स्वय़म् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
पिधाय़ कर्णौ सद्वृत्तः प्रस्थितो येन राघवः |
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
पिधाय़ कर्णौ सुश्रोणी मैवमित्यव्रवीद्वचः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
पिनद्धां धूमजालेन प्रभामिव विभावसोः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
पिनह्य तानि पुष्पाणि केशेषु वरवर्णिनी |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
पिनाकनाराय़णचक्रसंनिभं; भय़ङ्करं प्राणभृतां विनाशनम् ||
१८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
पिनाकपाणिः सङ्क्रुद्धः स्वय़ं रुद्रः पशुष्विव ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
पिनाकपाणिर्भगवान्सर्वपापहरो हरः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
पिनाकपाणिर्विहितोऽत्र योद्धा; विभीषय़न्दानवानुद्यतोऽसौ ||
१०२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
उमो उवाच
पिनाकपाणे वरद संशय़ो मे महानय़म् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
पिनाकपाणय़े नित्यं खड्गशूलधराय़ च ||
१५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
पिनाकमिति चोवाच शूलमुग्राय़ुधः प्रभुः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
पिनाकमिति विख्यातं स च वै पन्नगो महान् ||
१२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
पिनाकमिव रुद्रस्य क्रुद्धस्याभिघ्नतः पशून् ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
पिनाकमिव रुद्रस्य क्रुद्धस्याभिघ्नतः पशून् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
पिनाकहस्तो भगवानभ्यागच्छत शङ्करः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
पिनाकिनं खण्डपरशुं लोकानां पतिमीश्वरम् |
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
पिनाकिनं महादेवं महाय़ोगिनमव्ययम् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
पिनाकिनं वज्रिणं तीक्ष्णदंष्ट्रं; शुभाङ्गदं व्यालय़ज्ञोपवीतम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
पिनाकिनं वज्रिणं दीप्तशूलं; परश्वधिं गदिनं स्वाय़तासिम् |
५९ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
पिनाकी वरदो रूपी दृष्टः स्पृष्टश्च पाणिना ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
पिनाकी सर्वभूतेशो भगनेत्रनिपातनः ||
५६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
पिनाकैः करवालैश्च तोमरप्रासकम्पनैः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
पिपासवो यय़ुर्देवाः शतक्रतुपुरोगमाः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
पिपासार्तोऽपि तद्दृष्ट्वा तृप्तः स्यान्नात्र संशय़ः ||
४ ग