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अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
पितॄणां देवतानां च मनुष्योरगरक्षसाम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
पितॄणां निधनं घोरमप्राप्तिं त्रिदिवस्य च ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
पितॄणां पुत्रपौत्राणां ज्ञातीनां सुहृदां तथा |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
पितॄणां प्रथमं भोज्यं तिलाः सृष्टाः स्वय़म्भुवा |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
पितॄणां मम राज्यस्य हरणस्योग्रधन्विनाम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
पितॄणां मातुलानां च सैन्यानां चैव सर्वशः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
पितॄणां मानुषाणां च कान्ता यास्त्वनुपूर्वशः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
पितॄणां वंशकर्तारं वने त्यक्त्वा क्व यास्यथ ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
पितॄणां विषय़ाञ्ज्ञात्वा तिर्यक्षु चरतां नृप |
७ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
पितॄणामक्षय़ं दानं प्रवदन्ति मनीषिणः ||
१०६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
पितॄणामथ विप्राणामतिथीनां च पञ्चमम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
जनमेजय़ उवाच
पितॄणामभिषङ्गात्तु नकुलत्वमुपागतः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
पितॄणामर्थसिद्ध्यर्थं चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संय़मतामहम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
पितॄणामिव धर्मोऽथ आदित्यानामिवाम्वुराट् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
पितॄनर्च्य प्रतिपदि प्राप्नुय़ात्स्वगृहे स्त्रिय़ः |
९ क
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
पितॄन्ददर्श गर्ते वै लम्वमानानधोमुखान् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
पितॄन्दश तु मातैका सर्वां वा पृथिवीमपि |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
पितॄन्देवांश्च प्रीणाति प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
पितॄन्देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पय़न् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
पितॄन्देवांस्तथा विप्रान्पूजय़ित्वा महाय़शाः |
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
पितॄन्देवानृषींश्चैव तथा वै यक्षदानवान् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
पितॄन्देवानृषीन्विप्रानतिथींश्च जनाधिप |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
भीष्म उवाच
पितॄन्पितामहान्पुत्रान्गुरून्सम्वन्धिवान्धवान् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
पितॄन्पुत्रप्लवेन त्वमात्मानं चैव तारय़ ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
पितॄन्पूज्यादितः पश्चाद्देवान्सन्तर्पय़न्ति वै |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
पितॄन्प्रीणय़ते चापि गतिमिष्टां च गच्छति ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
पितॄन्भ्रातॄन्वय़स्यांश्च पुत्रानपि तथापरे ||
८७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
पितॄन्मां चैव दुःखार्तां विहाय़ क्व गमिष्यसि ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
पितॄन्सन्तर्पय़ित्वा तु वलिं कुर्याद्विधानतः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
पितॄन्स्वधाभिः कामैश्च स्त्रिय़ः स्वाः पुरुषर्षभ ||
१०९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
पितेव नित्यं सौहार्दात्पितेव स हि धर्मतः |
४३ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
पितेव पासि धर्मज्ञ तथा प्रव्रजितानपि ||
११३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
पितेव पुत्रं गाङ्गेय़ः परिष्वज्यैकवाहुना ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः; प्रिय़ः प्रिय़ाय़ार्हसि देव सोढुम् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
पितेव पुत्रांस्त्वरितोऽभ्ययात्ततः; सन्तारय़िष्यंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
पितेव पुत्रान्रक्षेथा व्राह्मणान्व्रह्मतेजसः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
पितेव पुत्रेषु स तेषु भावं; चक्रे कुरूणामृषभो महात्मा |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
पितेव हि नृपोऽस्माकमभूच्छान्तनवः पुरा |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
पितेवास्मान्समाधत्ते यः सदा पार्थिवर्षभः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
पितैष सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
पित्तं श्लेष्मा च वाय़ुश्च एष सङ्घात उच्यते ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
पित्रा च पालितो वालः स हतः कालधर्मणा ||
३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
पित्रा तु तव राजेन्द्र पाण्डुना पृथिवीक्षिता |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
पित्रा तु मम सावस्था प्राप्ता निर्वन्धुना यथा |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
पित्रा तुष्टेन मे पूर्वं यदा कालीमुदावहत् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
पित्रा ते मुनिभिश्चैव ततोऽहमनुमानितः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
पित्रा त्यक्ता तथा मात्रा भ्रात्रा चाहमसंशय़म् |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
पित्रा त्वय़ा च दाशार्ह दृप्तं सिंहमिवोत्कटम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ३८
शमीक उवाच
पित्रा पुत्रो वय़ःस्थोऽपि सततं वाच्य एव तु |
४ क