स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
पतन्त्यभिमुखा भूमौ कृपणं वत केशव ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
पतन्त्यविरलाः शूलाः शतघ्न्यः पट्टिशास्तथा ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
पतन्त्यविरलाः शूलाः शतघ्न्यः पट्टिशास्तथा ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
पतन्त्यस्तत्र दृश्यन्ते गिरिशृङ्गोपमाः शुभाः |
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
पतन्त्या स तय़ा वेगाद्राक्षसोऽशनिनादय़ा |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
पतन्त्युल्काः सनिर्घाताः शुष्काशनिविमिश्रिताः ||
३२ ग
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
पतन्नवाक्षिरा भूमौ हस्त्यारोहानपोथय़त् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
पतन्स ददृशे चापि खर्वितं च दिवाकरम् ||
८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
पतमानस्तु स वभौ पर्णाशाय़ाः प्रिय़ः सुतः |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
पतमानां सरिच्छ्रेष्ठां धारय़िष्ये त्रिविष्टपात् ||
४ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
पतमानांश्च सम्प्रेक्ष्य वित्रेसुस्तव सैनिकाः ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
पतमानाः स्म दृश्यन्ते गिरिशृङ्गान्नगा इव ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पतमानानि तान्युर्व्यां कुर्वन्ति विपुलं स्वनम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
पतमाने रथाद्भीष्मे वभूव सुमहान्स्वनः ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्राह्मण उवाच
पतमानो हि नरके भवतास्मि समुद्धृतः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
पतस्यव्याहरंश्चेदं न नो गुह्यं प्रभाषसे ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
पतस्युदीर्णाम्वुधरान्धकारा; त्खात्खेचराणां प्रवरो यथार्कः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२०
मार्कण्डेय़ उवाच
पताका कार्त्तिकेय़स्य विशाखस्य च लोहिता ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
पताका धूय़मानाश्च श्वसता मातरिश्वना |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
पताका विप्रकीर्यन्ते छत्राण्येतानि चार्जुन ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
पताकां चक्रगोप्तारौ सर्वोपकरणानि च |
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
पताकां चक्ररक्षौ च ध्वजं खड्गं च मारिष |
८६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
पताकादीपिकाकीर्णे दिव्यघण्टानिनादिते |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
पताकाध्वजवानीरा हतवाहनवाहिनी |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
पताकाध्वजवृक्षाढ्या मर्त्यकूलापहारिणी |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
पताकाध्वजसञ्छन्नं पदातीनां महद्वलम् |
५१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
पताकाभिर्विचित्राभिः सघण्टाभिः समन्ततः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
पताकाभिर्विचित्राभिर्ध्वजैश्च विविधैरपि |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
पताकाश्च ततस्तास्तु श्वसनेन समीरिताः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
पताकाश्च स तूणीरान्रश्मीन्योक्त्राणि चाभिभो |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
पताकिनं वज्रनिपातनिस्वनं; सिताश्वय़ुक्तं शुभतूणशोभितम् |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
पताकिनं वातजवैर्हय़ोत्तमै; र्युक्तं समास्थाय़ यय़ौ जय़ाय़ ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
पताकिनं शोणहय़ं वेदीकृष्णाजिनध्वजम् |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
पताकिना भीमनिनादकेतुना; हिमेन्दुशङ्खस्फटिकावभासिना |
५३ ख
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
पताकिनो मण्डलिनः फणवन्तश्च सर्वशः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
पताकी काञ्चनस्रग्वी ध्वजः कर्णस्य संय़ुगे |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
पताकय़ावधूताश्च हताः केचित्सुरद्विषः |
६९ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
पतिं च मे प्रदिशतु स्वय़ं वा पतिरस्तु मे ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
पतिं दैवतवच्चापि चिन्तय़न्त्यः स्थिता हि याः ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
पतिं द्रक्ष्यसि कल्याणि कल्याणाभिजनं नृपम् ||
९० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
पतिं पुत्रमिवोपास्ते सा नारी धर्मभागिनी ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
पतिं विना जीवति या न सा जीवति दुःखिता ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
पतिं विना मृतं श्रेय़ो नार्याः क्षत्रिय़पुङ्गव |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनः पुनः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनः पुनः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
पतिं हत्वा कुलं चेदमुत्साद्य धनलुव्धय़ा ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
पतिः कुरूणां गजसिंहगामी; विशालवक्षाः पृथुलोहिताक्षः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
पतिः सर्वकलिङ्गानां यय़ौ केतुमता सह ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२५१
वैशम्पाय़न उवाच
पतिः सौवीरसिन्धूनां दुष्टभावो जय़द्रथः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
पतिकामा च भर्तारं सर्वकामांश्च मानवः |
४३ ख